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ग़ज़ल- मिला कुछ नहीं जाँच पड़ताल में।

बह्र- फऊलुन फऊलुन फऊलुन फउल

मग़रमच्छ घड़ियाल को जाल में।
फँसा कर रहेंगे वो हरहाल में।

खुदा जाने होंगी वो किस हाल में।
मेरी बेटियाँ अपनी ससुराल में।

निकालो नहीं बाल की खाल को,
नहीं कुछ रखा बाल की खाल में।

नतीजा सिफर का सिफर ही रहा,
मिला कुछ नहीं जाँच पड़ताल में।

मिनिस्टर का फरमान जारी हुआ,
गधे बाँधे जायेंगे घुड़साल में।

हुई हेकड़ी सारी गुम उसकी तब,
तमाचा पड़ा वक्त का गाल में।

कभी जिसमें पानी की बूँदें न थीं।
कमल खिल रहे हैं उसी ताल में।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Ram Awadh VIshwakarma on January 13, 2018 at 6:46pm

आदरणीय आप सही फरमा रहे हैं। मुहावरा यही है। यह शेर  जबरदस्ती भर्ती का है। मुझे भी आभास हो रहा था कि मुहावरा गाल पर होता है न कि गाल मे।

Comment by Ajay Tiwari on January 13, 2018 at 6:05pm

आदरणीय राम अवध जी, अच्छे अशआर हुए हैं, हार्दिक बधाई.

'तमाचा पड़ा वक्त का गाल में'    मुहावरे के अनुसार तमाचा गाल 'पर' पड़ता है.

सादर    

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