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तरही ग़ज़ल, जनाब निलेश 'नूर' साहिब की नज़्र

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन

बताऊँ,कैसे शब-ए-इन्तिज़ार गुज़री है
मेरे हवास पे होकर सवार गुज़री है

यही तो होता है हर शब हमारे सीने पर
ग़मों की फ़ौज बनाकर क़तार गुज़री है

न जाने कितनी तमन्नाओं का लहू पीकर
बड़ी ही धूम से फ़स्ल-ए-बहार गुज़री है

तुम्हें ख़बर ही नहीं है कि ये शब-ए-हिज्राँ
किसी ग़रीब का करके शिकार गुज़री है

तुम्हारा साथ जहाँ तक रहा वहाँ तक तो
हयात मेरी बहुत शानदार गुज़री है

हमारी नस्ल भी मग़रिब की तर्ज़ पर देखो
बनाके जिस्म पे नक़्श-ओ-निगार गुज़री है

समर कबीर
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 12:07pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 12:06pm
जनाब निलेश'नूर'साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 12:04pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और दाद-ओ-तहसीन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 12:02pm
जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 12:01pm
जनाब गुरप्रीत सिंह जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 11:59am
जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on May 22, 2017 at 11:57am
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार ह् ।
आपके माध्यम से मंच को बता रहा हूँ कि 27मई से रमज़ान का महीना शुरू होने जा रहा है,इस कारण से मैं 25 तारीख़ से एक महीने की छुट्टी पर जा रहा हूँ,जनाब योगराज प्रभाकर साहिब से मैंने इसकी रज़ा ले ली है,और उन्होंने मेरी एक महीने की छुट्टी की मंज़ूरी दे दी है ।
Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on May 21, 2017 at 4:28pm

"तुम्हें ख़बर ही नहीं है कि ये शब-ए-हिज्राँ
किसी ग़रीब का करके शिकार गुज़री है"
वाह ! वाह ! बहुत खूब !! उम्दा ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद कुबूल करें आदरणीय  Samar kabeer जी | 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 21, 2017 at 2:53pm
वाह वाह
बताऊँ,कैसे शब-ए-इन्तिज़ार गुज़री है
मेरे हवास पे होकर सवार गुज़री है..बेमिसाल
यही तो होता है हर शब हमारे सीने पर
ग़मों की फ़ौज बनाकर क़तार गुज़री है..क्या कहने आदरणीय अनुकरणीय..हर एक शे'र बेहतर से बेहतर..सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 21, 2017 at 2:03pm

आदरनीय समर भाई , हमेशा की तरह खूबसूरत गज़ल कही है आपने , हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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