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नज़र में कोई सूरत है? नहीं तो (ग़ज़ल)

1222 1222 122

मुहब्बत की ज़रुरत है? नहीं तो
ये ग़म क्या रस्म-ए-उल्फ़त है? नहीं तो

तेरी इसपर हुक़ूमत है? नहीं तो
ये दिल तेरी रियासत है? नहीं तो

ये दुनिया ख़ूबसूरत है? नहीं तो
किसी में आदमीयत है? नहीं तो

कोई मंज़र नहीं जँचता है गोया
नज़र में कोई सूरत है? नहीं तो

किसी दिन चाँद उतरे मेरे छत पर
उसे क्या इतनी फुरसत है? नहीं तो

मुहब्बत से ही इतना कुछ मिला है
कुछ और पाने की चाहत है? नहीं तो

कि मर-मर के भी साँसें चल रही हैं
तुम्हें क्या जीने की लत है? नहीं तो

इक अरसे बाद लौट आया तो है दिल
मगर क्या इसको राहत है? नहीं तो

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by गिरिराज भंडारी on May 2, 2017 at 12:33pm

आदरणीय जयनित भाई , अच्छी गज़ल हुई है , बधाइयाँ स्वीकार करें । बाक़ी बातों के लिये मै भी आदरणीय समर भाई जी से सहमत हूँ , सलाह के बाद उपस्थिति  और तद अनुसार पटल पर सुधार दोनो हों तभी बात पूरी होती है ... । आज कल कई ग़ज़लों मे मैने देखा है ये लिखे कि अपनी प्रति मे मैने सुधार कर लिया है ...  ये अधूरी बात है ।

Comment by Samar kabeer on May 2, 2017 at 10:07am
"किसी दिन चाँद उतरे मेरे छत पर'
इस मिसरे में 'छत'शब्द स्त्रीलिंग है, इसलिये ये मिसरा यूँ कर लें:-
'किसी दिन चाँद उतरे मेरी छत पर'
Comment by जयनित कुमार मेहता on May 2, 2017 at 8:46am
आदरणीय रवि शुक्ला जी, बहुत बहुत आशीर्वाद है आपका। अपरिहार्य कारणों से आयोजन में शामिल नहीं हो सकने का अफ़सोस है।
Comment by जयनित कुमार मेहता on May 2, 2017 at 8:44am
आदरणीय समर कबीर जी, सर्वप्रथम मैं अपनी ग़लती स्वीकार कर आपसे विनम्रतापूर्वक क्षमादान मांगता हूँ।
मैं स्वीकार करता हूँ कि पिछली कुछ रचनाओं पर मैं आलस्यवश उनपर प्राप्त हुई प्रतिक्रियाओं का प्रत्युत्तर नहीं दे पाया हूँ, लेकिन इसका अर्थ कृपया यह न समझें कि मुझे इस्लाह पसंद नहीं है। इस मंच से जुड़ने का मुख्य उद्देश्य आप जैसे अनुभवी गुणी जनों का आशीर्वाद पाना ही है। मैं आपसे वादा करता हूँ कि आगे से मेरे और इस मंच के बीच आलस्य बाधा नहीं बनेगा।
आपकी समीक्षात्मक टिप्पणी की प्रतीक्षा है। सादर!!
Comment by Samar kabeer on May 1, 2017 at 6:16pm
जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब,आप ग़ज़ल तो मंच से साझा करते हैं,अच्छी बात है लेकिन उस पर आई टिप्पणियों ख़ासकर जिन टिप्पणियों में आपकी ग़ज़ल की सही समीक्षा की जाती है,उसका जवाब देना भी मुनासिब नहीं समझते,इससे ये साबित होता है कि आपको इस्लाह पसन्द नहीं है,इसलिये अब आपकी ग़ज़ल की तारीफ़ ही मुनासिब है ।
अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबफ पेश करता हूँ ।
Comment by Ravi Shukla on May 1, 2017 at 6:05pm

आदरणीय जयनित जी बहुत ही बढि़या गजल कही आपने मुशायरे में किसी कारण से न आ पाए हो पर गजल की कमी पूरी हो गई

कोई मंज़र नहीं जँचता है गोया
नज़र में कोई सूरत है? नहीं तो बहुत अच्‍छा शेर लगा हमें   दाद के साथ मुबारक बाद पेश है

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