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सभी रिश्ते है मतलब के ये मानो या न मानो तुम,
है मिलते प्यार में धोखे ये मानो या न मानो तुम,
 
रहूँ मैं राम भी बनके अगर हो भरत सा भाई,
है माता कैकई घर मे ये मानो या न मानो तुम,      
 
यकीं मानो न बिगड़ेगा कभी भी गैर के कारण,
करेंगे वार बस अपने ये मानो या न मानो तुम,
 
पड़े अब आँख पर परदे नये रिश्तों के शीशे से,
हैं टूटे खून के धागे ये मानो या न मानो तुम,
 
कलेजा चीर भी दोगे नहीं कुछ मोल है "बागी"
रहा पानी न आँखों में ये मानो या न मानो तुम

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Comment by Rajendra Swarnkar on May 31, 2011 at 10:16pm
आदरणीय गणेश जी "बागी"जी
नमस्कार !

अच्छी ग़ज़ल कही है भाईजी !

यकीं मानो न बिगड़ेगा कभी भी ग़ैर के कारण
करेंगे वार बस अपने ये मानो या न मानो तुम
वाऽऽह ! क्या कहने है जनाब !

एक शे'र मुलाहिजा फ़रमाएं -
यहां गर हम नहीं आते , बहुत नुकसान में रहते
कहां हम आपसे मिलते ये मानो या न मानो तुम !
:)

बहुत बहुत बधाई !

राजेन्द्र स्वर्णकार
Comment by Dheeraj on May 30, 2011 at 12:07pm
क्या उम्दा ग़ज़ल लिखी है गणेश जी... बहुत ही असाधारण और सच्चाई से प्रेरित ग़ज़ल है. सच मे दिल की गहराई मे उतरने लायक ज़ज़्बात है

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 30, 2011 at 10:50am
धन्यवाद नीलम दीदी |
Comment by Neelam Upadhyaya on May 30, 2011 at 10:48am
bahut hi sunder rachna hai. 

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 30, 2011 at 9:59am
आदरणीय हिरा लाल जी, सराहना हेतु धन्यवाद, स्नेह बनाये रखे |
Comment by HIRALAL KASHYAP on May 29, 2011 at 6:46pm
ATI SUNDER GANESH JEE


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 29, 2011 at 2:53pm

आदरणीय ब्रिजेश भईया, आपके अनुभवी नजर को नमन, आपने ग़ज़ल की आत्मा से साक्षात्कार कर अपनी भावनाओं को प्रस्तुत किया है, मैं सलाम करता हूँ | 

 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 29, 2011 at 2:50pm
परम आदरणीय आचार्य जी, आपका आशीर्वाद पाना सदैव मेरे लिए धरोहर सा रहा है, आज पुनः मेरे प्रयास को आपका आशीर्वाद प्राप्त हुआ, मैं धन्य हुआ |

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 29, 2011 at 2:48pm
अरुण भाई, हौसलाफजाई हेतु शुक्रिया |
Comment by Dr.Brijesh Kumar Tripathi on May 29, 2011 at 2:22pm
 
ये मन की भावनाएं जो उतर कागज़ में आयीं है 
कोई सदमा लगा दिखता ये मानो या न मानो तुम 
बहुत सुन्दर ...रचा भैया ग़ज़ल यह  एक सचाई है
कहीं गहरे उतरती है यह मानो या न मानो तुम
गैर तो अक्सर अपने प्यार से दिल में उतरते हैं
ज़फ़ा अपने ही करते हैं ये मानो या न मानो तुम
 
गणेश भैया परिवेश पर चोट करती ये रचना बहुत सुन्दर है खास तौर पर ये मिसरे
पड़े अब आँख पर परदे नये रिश्तों के शीशे से,
हैं टूटे खून के धागे ये मानो या न मानो तुम,
 
कलेजा चीर भी दोगे नहीं कुछ मोल है "बागी"
रहा पानी न आँखों में ये मानो या न मानो तुम
मैं अपनी भावनाए रोक नहीं पाया इसलिए आपकी तरह पर ही मैंने आपकी ग़ज़ल पर प्रतिक्रिया देने की कोशिश की है

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