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"तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो", बालों में अंगुलियां फिराते हुए उसने कहा|
"हूँ", कहते हुए वह खड़ी होने लगी|
"थोड़ी देर और बैठो ना", उसने उसका हाथ पकड़ कर खींच लिया| वह वापस बिस्तर पर बैठ गयी|
"सच में तुमको देखे बिना चैन नहीं मिलता", एक बार फिर उसने उसका हाथ पकड़ा|
वह उसको लगभग अनदेखा करते हुए बैठी रही| थोड़ी देर बाद वह फिर से उठने लगी तो उसने कहा "तुम जवाब क्यों नहीं देती, क्या मैं तुम्हें अच्छा नहीं लगता?
"लगते तो हो, लेकिन तुम्हीं नहीं, बाकी सब भी", उसने एक गहरी नजर डाली और खड़ी हो गयी|
उसको बुरा लगा, सबके बराबर बना दिया उसने|
"मैं बाकियों जैसा नहीं हूँ, तुमसे एक रिश्ता सा जुड़ गया है अब", और भी कुछ बोलना चाहता था वह लेकिन उसकी नजर से सामना होते ही जैसे शब्दों ने उसका साथ छोड़ दिया|
"मुझे यहाँ लाने वाला भी मुझसे बहुत गहरा रिश्ता रखता था, आगे से रिश्ते की बात मत कहना"|
वह दरवाजा खोलकर बाहर निकल गयी, उसने भी चुपचाप कपडे पहने और निकल गया|
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by Neelam Upadhyaya on January 19, 2017 at 3:15pm

बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति. बधाई.

Comment by Samar kabeer on January 19, 2017 at 2:15pm
जनाब विनय कुमार जी आदाब,हमेशा की तरह बहुत उम्दा लघुकथा लिखी है आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by विनय कुमार on January 19, 2017 at 2:07pm

बहुत बहुत आभार आ मिथिलेश वामनकरजी इस टिपण्णी के लिए 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 19, 2017 at 1:35pm
आदरणीय विनय जी, पुरुष प्रधान समाज में नारी की दुर्गति होती है तो उसका रिश्तों से विश्वास उठना वाजिब है। आपने बहुत ही कसावट के साथ प्रस्तुति को शाब्दिक किया है। इस सफल लघु कथा हेतु हार्दिक बधाई। सादर

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