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हम उनके बिना भी हुए कब अकेले (ग़ज़ल)

बह्र :  १२२ १२२ १२२ १२२

 

सनम छोड़ जाते हैं यादों के मेले

हम उनके बिना भी रहे कब अकेले

 

मैं समझाऊँ कैसे ये चारागरों को

उन्हें छू के हो जाते मीठे करेले

 

रहे यूँ ही नफ़रत गिराती नये बम

न कम कर सकेगी मुहब्बत के रेले

 

मैं कितना भी कह लूँ ये नाज़ुक बड़ा है

सनम बेरहम दिल से खेले तो खेले

 

इन्हें दे नये अर्थ नन्हीं शरारत

वगरना निरर्थक हैं जग के झमेले

-------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on November 27, 2016 at 9:47pm

जनाब धर्मेंद्र   कुमार साहिब  ,अच्छी ग़ज़ल हुई है , दाद के साथ  मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं --

Comment by Samar kabeer on November 27, 2016 at 9:09pm
जनाब धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
"मुए"शब्द बैगमाती ज़बान का है, मर्दों को ज़ेब नहीं देता ।

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