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गजल - अनमोल पल थे हाथ से सारे फिसल गये

221 2121 1221 212*

अनमोल पल थे हाथ से सारे फिसल गये
अपनों ने मुंह को फेर लिया दिन बदल गये।।

कुछ ख्वाब छूटे कुछ हुए पूरे, हुआ सफर
यादो के साथ साल महीने निकल गये।।

शरमा के मुस्कुरा के जो उनकी नजर झुकी
मदहोश हुस्न ने किया बस दिल मचल गये।।

बचपन के मस्त दिन भी हुआ करते थे कभी
बस्तो के बोझ आज वो बचपन कुचल गये।।

ओढे लिबास सादगी का भ्रष्ट तंत्र में
नेता गरीब के भी निवाले निगल गये।।

करते है बेजुबान को वो क़त्ल इस तरह
वहशत को देख कर ये मनाज़िर दहल गये।।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by नाथ सोनांचली on October 17, 2016 at 2:27pm
आदरणीय प्रमोद श्रीवास्तव जी आपको गजल का मन देने के लिए धन्यवाद
Comment by PRAMOD SRIVASTAVA on October 17, 2016 at 12:34pm

"नेता गरीब के भी निवाले निगल गये"

बहुत सुंदर कटाक्ष, एकदम पैनी। तहे दिल से बधाई स्वीकार  करें। 

Comment by नाथ सोनांचली on October 16, 2016 at 10:38pm
अलका जी सादर अभिवादन
Comment by नाथ सोनांचली on October 16, 2016 at 10:37pm
आद0 राजेश कुमारी जी सादर प्रणाम।
Comment by नाथ सोनांचली on October 16, 2016 at 10:37pm
विजय जी ह्रदय से धन्यवाद मित्र
Comment by अलका 'कृष्णांशी' on October 16, 2016 at 9:15pm

वाह्ह्ह्ह  बहुत सूंदर  ग़ज़ल  है आद० सुरेन्द्र नाथ जी हार्दिक बधाई। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 13, 2016 at 8:18pm

वाह्ह्ह्ह  बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने आद० सुरेन्द्र नाथ जी हार्दिक बधाई 

Comment by vijay nikore on October 13, 2016 at 3:18pm

गज़ल अच्छी बनी है। मुबारक ।

Comment by नाथ सोनांचली on October 10, 2016 at 7:54pm
जनाब समर कबीर साहब आपके आशीष मिली तो मेहनत सफल हुई
Comment by Samar kabeer on October 10, 2016 at 5:30pm
जनाब सुरेन्द्र नाथ सिंह जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।

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