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घर का माहौल ग़मगीन था, डॉक्टर ने दोपहर को ही बता गया था कि माँ बस कुछ देर की ही की मेहमान हैI माँ की साँसें रह रह उखड रही थीं, धड़कन शिथिल पड़ती जा रही थी किन्तु फिर भी वह अप्रत्याशित तरीके से संयत दिखाई दे रही थीI ज़मीन पर बैठा पोता भगवत गीता पढ़ कर सुना रहा था, अश्रुपूरित नेत्र लिए बहू और बेटा माँ के पाँवों की तरफ बैठे सुबक रहे थेI

“तुम्हें कुछ नहीं होगा माँ जी, तुम अच्छी हो जाओगीI” सास के मुँह में गँगाजल डालते हुए बहू की रुलाई फूट पड़ीI
“तुमने तो उम्र भर मेरी इतनी सेवा की जितनी मेरी अपनी बेटी भी न कर पातीI”
“हमे माफ़ कर देना माँ, गरीबी के कारण..." माँ के ठन्डे पड़ते हाथ-पाँव को मालिश करता हुआ बेटा बस इतना ही बोल पायाI
“अरे बेटा! मैं तो बहुत खुश खुश जा रही हूँI” माँ के चेहरे पर संतोष के भाव थेI
“माँ! रूखी सूखी खाकर भी तुमने कभी कोई शिकायत नहीं की....”
“न हम कुछ देने के लायक थे न तुम ने कभी कुछ माँगा...."
"अगर कोई इच्छा हो तो बताओ माँI"
“आज मैं एक चीज़ माँगूंगी तुमसे, इनकार मत करना बेटाI" डूबते हुए स्वर में माँ ने कहाI 
“हाँ हाँ, बोलो माँI"
“एक वचन चाहिए तुम दोनों सेI”
"मैं वचन देता हूँ माँ, तुम कहो तो...”
ठण्डे चूल्हे और आटे के खाली कनस्तर की तरफ ताकते हुए माँ ने कहा:
“वचन दो कि मेरे मरने के बाद तुम कभी मेरा श्राद्ध नहीं करोगे.”
(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Dr. Vijai Shanker on October 10, 2016 at 1:24pm
आदरणीय योगराज प्रभाकर जी ,
बात कुछ विषय से इतर जा रही है , पर कहना चाहूँगा। शायद गत कई वर्षों से विदेश में रहने के कारण से मेरा ध्यान इन बातों पर जाता है। कहीं न कहीं हम बड़े भ्रम में रहते हैं , अपने अतीत पर गर्व भी करते हैं और उसी पर व्यंग भी करते हैं , देश - समाज को एक स्वस्थ परिवेश , विचार , जीवन देना तो बहुत दूर की बात , उस दिशा में एक कदम भी चलते नहीं दिखाई पड़ते हैं। बात को संक्षेप रूप देने के लिए इन पंक्तियों का प्रश्रय लूँगा ,
साँई इतना दीजिये जामे कुटुंब समाये ,
मैं भी भूँखा न रहूँ साधू भी न भूँखा जाए।
यहां साईँ केवल ईश्वर नहीं है , वे भी हैं जो व्यवस्था चला रहे हैं और यदि वे सही तरह से व्यवस्था चलाएं तो आदमी इतना तो कमा ही लेगा कि घर चल जाए और साधू भी भूखा न जाए, क्योंकि ईश्वर ने अपनी सृष्टि और प्रकृति में इतनी व्यवस्था तो सबके लिए कर रखी है। हमारे पौराणिक साहित्य में भी राजा से इस प्रकार धर्मंन शासन चलाने की अपेक्षा की गई है कि प्रजा त्रिवर्ग ( अर्थात धर्म , अर्थ , काम तीनों पुरुषार्थ ) का पालन सुचारू रूप से कर सके। यदि इतना हो जाए तो बहुत सी कहानियां जन्म नहीं लेंगी। शायद आज साहित्य में केवल दुर्दशा का उल्लेख कर देने मात्र से काम नहीं चलने वाला है , ऐसा तो फ्रांस में हुआ था और सारी दुनियाँ बदल गई पर वे नहीं बदले जो बदलना ही नहीं चाहते हैं। उन्हें और आगे का मार्ग भी दिखाना होगा। वैसे, और साहित्य का काम है क्या ?
सादर।

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 10, 2016 at 11:19am

भाई उस्मानी जी, आपको रचना पसंद आई यह जानकार संतोष हुआI बहुत बहुत शुक्रियाI 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 10, 2016 at 11:17am

हार्दिक आभार आ० नीता कसार जीI


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 10, 2016 at 11:17am

लघुकथा को पसंद फरमाने के लिए तह-ए-दिल से शुक्रिया मोहतरम जनाब समर कबीर साहिबI


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 10, 2016 at 11:16am

आपकी प्रशंसा और सराहना मेरे लिए बहुत मायने रखती है भाई धर्मेन्द्र कुमार सिंह जीI आपके शुभ वचनों के लिए आपका दिल से शुक्रिया अदा करता हूँI 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 10, 2016 at 11:15am

हार्दिक आभार भाई हरिकृष्ण ओझा जीI


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 10, 2016 at 11:11am

आ० डॉ विजय शंकर जी, आपकी इस विस्तृत वैदूश्यपूर्ण टिप्पणी और उत्साहवर्धन हेतु आपका ह्रदयतल से आभार व्यक्त करता हूँI आपने अमीरी-गरीबी की बात की और भाई विनोद खनगवाल जी ने हरियाणा के गाँव का एक किस्सा साझा किया हैI अत: मैं भी स्वयं को इस लघुकथा से सम्बंधित एक रोचक बात बताने से रोक नहीं पा रहा हूँI लघुकथा विधा के बारे में यह कहा जाता है कि किसी भी घटना को अक्षरश: नहीं लिखा जाना चाहिएI उस घटना में अपनी कल्पनाशीलता का पुट देने से ही वह लघुकथा के रूप में ढल सकती हैI दरअसल यह लघुकथा एक सत्य घटना पर आधारित है जिसे मैंने उसकी मूल भावना को अक्षुण्ण रखते हुए अलग तरीके से ब्यान करने का प्रयास किया हैI
.
यह हमारे शहर के एक धनाड्य परिवार की कहानी हैI उस परिवार में पति-पत्नी के इलावा उनके 3 शादीशुदा बेटे थेI माँ-बाप भारतीय मूल्यों और संस्कारों को मानने वाले थे, लेकिन उनके तीनो बेटे रहन-सहन और तबीयत से अंग्रेज़ थेI वे तीनो ही अपनी अपनी फेमिली के साथ विदेश में बसने की कवायद में मसरूफ थेI बुज़ुर्ग पिता जी जब अपने माँ-बाप का श्राद्ध करते तो तीनो बेटे नाक भौं सिकोड़ लेते और ऐसे सभी कर्मकांडों को रूढ़िवादी बतातेI ऐसा भी सुना है कि एक बार बेटों ने घर आए पण्डितों की बेईज्जती भी कीI बहरहाल, एक दिन बुज़ुर्ग मियाँ-बीवी ने आपस में सलाह मशविरा किया कि उनके मरने के उनके बेटे उनका श्राद्ध नहीं करेंगेI और ऐसा न करने से वे पाप के भागी बन जायेंगेI तो एक दिन उन्होंने फैसला किया कि वे दोनों जिंदा-जी गया जी जाकर अपना श्राद्ध कर्म करवाएंगे ताकि उनके बच्चों पर कोई पितृ-ऋण न चढ़ेI उन्होंने किया भी वैसा ही, गया जी से वापिस आने के बाद उन्होंने अपने बेटों से कहा कि अब वे श्राद्ध के उत्तरदायित्व से मुक्त हैंI                

मैंने इस घटना को एज़-इट-इज़ नहीं लिखा, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि "पितृ-ऋण" जैसे किसी वहम-भ्रम को बढ़ावा मिलेI जैसा कि भाई हरिकृष्ण ओझा जी ने लिखा है कि श्राद्ध दरअसल मृत पुरखों के प्रति श्रद्धा का नाम है, तो मैं कुछ ऐसा नहीं लिखना चाहता था जोकि हमारी इस सदिओं पुरानी परम्परा के विरोध में जाता होI मैंने ऐसा भी कुछ नहीं लिखा जिससे यह सन्देश भी जाए कि चाहे खुद के खाने के लिए घर में दाना न हो, लेकिन पुरोहितों को भरपेट पकवान खिलाना लाज़मी हैI अत: उस सच्ची घटना (कथानक) को मैंने अपने शब्दों में यूँ ब्यान किया हैI


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on October 10, 2016 at 10:38am

हार्दिक आभार भाई विनोद खनगवाल जी, वाकई एक शब्द छूट गया थाI गलती की तरफ ध्यानाकर्षण हेतु दिल से शुक्रिया, अब वह पंक्ति सुधार ली हैI  

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 10, 2016 at 6:30am
आदरणीय योगराज प्रभाकर जी , बहुत ही गंभीर विषय लिया है आपने इस लघु- कथा में। सदियों से मनुष्य अपने पूर्वजों को तरह-तरह से स्मरण करता और पूजता आ रहा है पर बात गरीबी पर आकर ठहर जाए तो सब समाप्त , सब क्षम्य है।
हम एक ऐसे देश में रहते हैं जो अतुल्य सम्पदा से भरा हुआ है , पर अव्यवस्था और जिद्द के चलते कुछ हो नहीं पाता हम उस पर न विचार करते हैं न बात करते हैं , हाँ , गरीबी जरूर दिखाते आएं हैं और दिखाते रहेंगे। भगवान् भी संभवतः गरीबी में ही रहता है इसीलिये हमारे सारे कर्णधार गरीबी बढ़ाने और उसे अधिक से अधिक स्थायित्व देने में लगे रहते हैं , बिचारे इस प्रयोजन में खुद अमीर से अमीर हुए जाते हैं। सेवा करना धर्म ही ऐसा है , अमीरी छप्पड़ फाड़ के बरसती है। गरीब के लिए जीवन गुनाह है और देश न जाने कितने तथाकथित पूज्य जनों के दिवस मनाता रहता है , कभी कभी तो छुट्टी भी कर देता है , उससे जो दैनिकी प्रभावित होती है वह भी उन्हीं के नाम। वे क्या देते हैं , ईमानदारी से विचार करें हम किस पूर्वज के नाम , आदर्श और नीतियों का पालन करते हैं। तुम्हारी भी जय जय , तुम्हारे विरोधी की भी जय जय। याद ही तो करना है , विचार हमारे अपने हैं।
प्रसंगतः , मृत्यु कोई साधारण परिवर्तन नहीं है , इतिहास मानता है कि मृत्यु ने ही मनुष्य को ईश्वर / परमात्मा या संसार को चलाने वाली किसी असीमित शक्ति के विषय में विचार करने की प्रेरणा दी है। बाहत कुछ है , पर शायद गरीबी से साक्षात लड़ना एक सामूहिक अनिवार्यता बन सामने खड़ी है। यह एक कल्याणकारी योजना नहीं होगी वरन हमारे सह-अस्तित्व के लिए एक सर्वोच्च अनिवार्यता होगी। पर पता नहीं हमारा ध्यान इस ओर कब जाएगा।
प्रसंगतः , यह भी कि राष्ट्र निर्माण में साहित्य की सबसे अहम् भूमिका होती है , यह वह होता है जिसे नेता भी पढ़ते हैं और बहुत कुछ सीखते और समझते हैं।
सम्प्रति , सचेत करती इस भावपूर्ण रचना के लिये यह भी उल्लेखनीय है कि माँ तो माँ होती है , जन्म देती है तो मृत्यु-तुल्य कष्ट सहती है और मरती है तो भी जीवन की कामना करती है , जीवन देती है , प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई। सादर।
Comment by harikishan ojha on October 9, 2016 at 11:54pm
ये श्राद्ध नहीं है ये तो श्रद्धा है जिस के बहाने हर साल हमारे पूर्वजो को याद किया जाता है, गरीबी से जूझ रहे परिवार की माँ ने सोचा कही मेरी मुक्ति के चक्र में और गरीब नही हो जाये इस लिए अच्छी सलाह, लेकिन हमारे पूर्वजो ने ये चीजे कुछ सोच समझ कर बनाई है, कोई जरुरी नहीं की आप कई पंडितो को भोजन करवायेगे तो ही मुक्ति मिलेगी, आप बस श्रद्धा से याद कर लो तो मुक्ति मिल जायेगी, बहुत ही सुन्दर कथा, धन्यवाद

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