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अपना दुःख किससे कहू मैं ,

अपना दुःख किससे कहू मैं ,
यहा कौन हैं सुनने वाला ,
हर तरफ फैला अन्धियारा ,
धधक रही दहेज की ज्वाला ,

बेटी के बाप तो हमभी हैं ,
बड़ी मुश्किल से पढ़ा पाए ,
हम खाय आधपेट मगर ,
बेटी को हम बी कॉम कराए ,

लड़का बढ़िया खोज रहा हु ,
दहेज़ के बिना हैं परेशानी ,
अब सोचता हु क्यों पढ़ाया ,
जन्मते क्यों नहीं नमक खिलाया ,

मर गई होती ये तब ,
परेशानी ये ना आती अब ,
ये लड़का वालो जरा समझो ,
हम भी पढाये ये तो समझो ,

जो ये कमाएगी तुम पावोगे ,
मेरे घर क्या ? भेजोगे ,
और एक बात बाबू जानो ,
लड़का लड़की में अंतर ना मानो ,

लडकी बिन हर लड़का कुवारा ,
ना मिले दुल्हिन बने आवारा ,
तब आप खूब पछताओगे ,
तब गुरु को साथ ना पावोगे ,

तब आप यही कहते फिरोगे ,
अपना दुःख किससे कहू मैं ,
यहा कौन हैं सुनने वाला ,

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Comment

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Comment by Neet Giri on June 25, 2010 at 6:29pm
guru jee bahut badhia kavita hain aapki
Comment by baban pandey on June 25, 2010 at 7:50am
अब सोचता हु क्यों पढ़ाया ,
जन्मते क्यों नहीं नमक खिलाया ,........padhte hi dahej lobhiyo ko katl karne ka man karta hai ....bahut hi achcha...

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 24, 2010 at 10:10pm
कमाल की रचना है गुरु जी, आप की रचना दहेज़ लोभियों को सन्देश देने मे सक्षम है, बहुत ही ओज है इस रचना मे , इस शानदार प्रस्तुति के लिये धन्यवाद स्वीकार करे गुरुवर, जय हो ...
Comment by Rash Bihari Ravi on June 24, 2010 at 5:02pm
धन्यवाद सर

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 24, 2010 at 5:00pm
बहुत दर्द है आपकी कविता में गुरु जी, एक बाप का दर्द ! क्या विडंबना है कि हालात एक बाप को यह सोचने तक को विवश कर देते हैं कि बेटी को पैदा होते ही क्यों ना मार डाला ! आपकी इस कविता में हजारों लाखों लोगों का दर्द छिपा है ! मुबारकबाद देता हूँ इस रचना के लिए आपको !

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