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थाम लो इन आंसुओं को
बह गए तो ज़ाया हो जाएंगे
इन्हें खंजर बना कर पेवस्त कर लो
अपने दिल के उस हिस्से में 
जहाँ संवेदनाएं जन्म लेती हैं

उसके काँधे पर रखी लाश से कहीं ज्यादा वज़न है
तुम्हारी उन संवेदनाओं की लाशों का 
जिन्हें अपने चार आंसुओं के कांधों पर 
ढोते आए हो तुम 
अब और हत्या मत करो इनकी

संवेदनाओं का कब्रस्तान बनते जा रहे तुम
हर ह्त्या, आत्महत्या, बलात्कार पर 
एक शवयात्रा निकलती है तुम्हारी आँखों से 
और चंद क़दम दूर जा कर तुम्हारे भीतर ही कहीं
दफ्न हो जाते हैं तुम्हारे एहसासात, तुम्हारी संवेदनाएं

अब इनको जिंदा रखना सीखो
हर ज़ख्म को ताज़ा रखना सीखो

मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by saalim sheikh on September 7, 2016 at 5:33am

बेहद शुक्रिया जनाब समर कबीर साहब, जनाब अशोक कुमार साहब, बृजेश कुमार साहब, आप जैसे माहिर लोगों ने काविश को सराहा ये मेरे लिए बेहद हौसला अफज़ाई की बात है, बेहद शुक्रिया  

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 3, 2016 at 7:22pm

अपने में कई सवालों को समेटे हुए शानदार रचना 

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 30, 2016 at 8:09am

वाह ! बहुत उत्तम अभिव्यक्ति देती सुंदर नज्म कही है आदरणीय सलीम शैख़ जी. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें. सादर.

Comment by Samar kabeer on August 28, 2016 at 3:01pm
जनाब सलीम साहिब आदाब,बहुत उम्दा अहसासात से भरपूर इस नज़्म के लिये मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।

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