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बुढ़िया
एक पेड़ के साये में एक बुढ़िया रहती थी । कोई नहीं जानता था उसको । बस वहाँ से गुज़रते लोगों को देखती ,चहल पहल देखती और गर कोई उसे कुछ दे देता तो खा लेती थी । उनकी झुर्रियाँ बहुत कुछ कहती थी । पर यह थी कौन कहाँ से आई कोई नही जानता था ।
लोगों का पहले तो ध्यान नहीं था पर रोज़ उसी जगह पर उसे देख वो एक आकर्षण का केंद्र बन गयी थी । "पर यह थी कौन ? "अ ने ब से पूछा जो यह किस्सा सुना रहा था ।
"एक दिन अख़बार की सुर्ख़ियों में इसके मौत की खबर देख एक आदमी आया था ।उसने उस बुढ़िया के लिये थाने में जाकर पूछताछ कि । वहां से पता चला की वो जिस पेड़ के साये में बैठती रहती थी उस पेड़ को उसके ससुरजी ने लगाया था । और जो बस्ती अब बन गयी थी वो ज़मीन असल में उसीकी थी । उसके बच्चों ने धोका देकर सब कुछ बेच दिया । पर तब से उसने अपने बच्चों को छोड़ दिया और वो यहाँ बैठती थी । "
"तो क्या फिर उनके बेटों को उसकी लाश दी गयी । उनके बच्चों का क्या हुआ ?" अ ने उत्सुकता वश जानना चाहा ।
"वो सामने घर देख रहे हो न ,वहां देखो उस पेड़ , और उसके ऊपर वो घोंसला । कौन कहता है टूटी शाखों पर घरोंदे नहीं बन सकते । " ब ने कहा ।
" पर आप यह सब कैसे जानते हो ?"
ब ने उत्तर दिया , " टूटी शाखों पर घरोंदा जो बसाना था । "


मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 15, 2016 at 8:41pm
धन्यवाद आदरणीय सात्विन्द्र भैया ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on August 15, 2016 at 4:14pm
हार्दिक बधाई आदरणीया कल्पना दीदी इस प्रस्तुति के लिए।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 13, 2016 at 9:46pm
धन्यवाद आदरणीय शहज़ाद भाई ।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on August 13, 2016 at 8:58pm
बिलकुल ही उम्दा अलग अंदाज़ में इस बढ़िया प्रस्तुति के लिए हृदयतल से बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीया कल्पना भट्ट जी।

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