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रिश्तों की भाषा

"रिश्तों की भाषा"

"नहीं समीर, इतना आसान कहां होता है सब कुछ भूल पाना।" वर्षो पहले एक रात अचानक उसे छोड़ कर चले जाने वाला पति आज फिर सामने खड़ा सब भूलने की बात कर रहा था।
"तान्या ! मैं मानता हूँ कि मैं तुम्हारे प्रेम को नकारकर 'उसके' साथ चला गया था लेकिन अब मेरा उससे अलगाव हो चुका है और मैं हमेशा के लिए तुम्हारे पास लौट आना चाहता हूँ।" उसकी आवाज और आँखे दोनों में अधिकार भरी याचना नज़र आ रही थी।
"आज तुम लौटना चाहते हो लेकिन उस समय तुमने एक बार भी नहीं सोचा कि मेरा क्या होगा ? अगर मेरे मित्र ने साथ नहीं दिया होता तो मैं ऐसे समय में जीवन का सामना कभी नहीं कर पाती।"
"तान्या ! अब तुम्हे उसका अहसान लेने की कोई जरूरत नहीं, हम फिर एक साथ रह सकते है।" उसने आगे बढ़कर तान्या के हाथ थाम लिए।
"समीर ! मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ।" जाने क्यों उसे समीर के हाथों में पति-प्रेम की अपेक्षा एक पुरुष-प्रेम का अहसास अधिक लगा। "तुम्हारे पीछे मुझे कुछ समय अपने मित्र के साथ भी रहना पड़ा और........., " समीर का चेहरे पढ़ते हुए तान्या ने सवालियां नजरे उस पर टिका दी। ".... हमारे बीच इसे लेकर कभी कोई दुविधा नहीं होगी !"
"तान्या ! तुम कैसे भूल गयी कि तुम एक 'ब्याहता' थी ?" बदलते भावो के साथ उसकी आवाज भी तल्ख़ होने लगी। ".......ये मेरी ही गलती थी जो मैं लौट कर चला आया।" और उसकी प्रतिक्रिया जाने बिना बात पूरी करते करते वो मुँह फेर चुका था।
वो खामोश खड़ी उसे दूर तक जाते देखती रही, देखती रही। दिल बार बार कह रहा था। "तान्या, उसे बताओ कि तुम सदा उसकी ही रही हो।" लेकिन जहन दिल को नकार एक ही बात कह रहा था। "जिस्म की देहरी पर खत्म होने वाले रिश्ते निस्वार्थ रिश्तों की भाषा नहीं पढ़ पाते।"
'विरेंदर वीर मेहता'
(मौलिक व् अप्रकाशित)

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Comment by VIRENDER VEER MEHTA on April 2, 2016 at 6:36pm
आदरणीया राहिला जी कथा पर आपकी होंसला बढाती प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार। कथा और कथा का प्रस्तूतिकरण आपको अच्छा लगा, मानो मेरा लिखना सफल हो गया। सादर।
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on April 2, 2016 at 6:32pm
आदरणीया नीता कसार जी रचना पर आपकी विवेचनात्मक टीप्पणी के लिए आपका हार्दिक आभार। रचना के जरिये मैंने पुरुष की उस मानसिकता को भी दिखाना चाहा है जो स्त्री के उन विचारो पर आपत्ति दर्ज करता जिन विचारो को जीवन में अपनाना अपना हक़ समझत है। सादर।
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on April 2, 2016 at 9:49am
आभार आदरणीय RAM BALI GUPTA जी कथा पर आप की प्रोत्साहन टिप्पणी के लिए। सादर।
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on April 2, 2016 at 7:56am
सादर आभार आदरणीय तेजवीर सिंह भाई जी रचना पर प्रोत्साहन टिप्पणी के लिए। आप की प्रत्क्रियाओ का सदैव ही स्वागत है। सादर।
Comment by Nita Kasar on April 1, 2016 at 7:55pm
ग़लतफ़हमियाँ दायरें बढ़ा देती है काश वह पत्नि की भावनाओं को समझने का प्रयास करता तो दायरे की दुनिया की खाई पाटी जा सकती थी लाजवाब कथा के लिये बधाई आद० वीर मेहता जी ।
Comment by रामबली गुप्ता on March 30, 2016 at 10:13am
वाह वाह बहुत ही सुंदर लघुकथा आदरणीय वीरेंद्र वीर जी
Comment by Rahila on March 30, 2016 at 1:08am
शानदार...,वाह्ह्ह. .बहुत बेहतरीन रचना । तारीफ़ के काबिल । बहुत बधाई आदरणीय सर जी! वार्तालाप की हर दूसरी लाइन पंच सी लगी । बहुत सटीक समाप्ति । सादर
Comment by TEJ VEER SINGH on March 29, 2016 at 8:53pm
हार्दिक बधाई वीर मेहता जी!बेहतरीन लघुकथा!

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