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क्या है जीवन, आज समझने मैं आया हूँ

कठिन समय का दर्द सदा ही पाया मैंने

बस आशा का गीत   हमेशा गाया मैंने

जब तुम बनते धूप, बना तब मैं साया हूँ

 

जन्म काल से सत्य एक जो जुड़ा हुआ है

मानव की उफ़ जात बनी ये आदत कैसी

सदा ज्ञात यह बात मगर क्यों भूले जैसी

वहीँ शून्य आकाश एक पथ मुड़ा हुआ है

 

आया है जो आज उसे निश्चित है जाना

इस माटी का मोह, रहे क्यों साँझ सकारे?

इस माटी का रूप बदल जायेगा प्यारे 

फिर भी रे इंसान सत्य को कब पहचाना

 

कठिनाई पर व्यर्थ मनुज तेरा रोना है

जीवन का उत्थान कर्म पथ से होना है

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Dr. Vijai Shanker on March 23, 2016 at 10:49am
नव प्रयास एवं सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई। प्रिय मिथिलेश जी , होली की शुभकामनायें , सादर।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 23, 2016 at 6:09am
बहुत सुंदर सार्थक सृजन!सादर नमन

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 22, 2016 at 11:49pm

वाह ! आपने कोर को ही पकड़ लिया सॉनेट का ! २४ मात्राएँ प्रति पंक्ति और संयोजन में रोला छन्द की वैधानिकता.. बहुत खूब !

इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाइयाँ आदरणीय मिथिलेश जी
शुभ-शुभ

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