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 1212         1122      1212     22

 

               हिसाब ( गजल )

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खुदा के सामने सबका हिसाब होता है

हरेक शख्स वहां बे-नकाब होता है  

 

अगर सवाल कोई है तो पूछ ले रब से

कि उसके पास तो सबका जवाब होता है

 

बिछे हों राह में कांटे अगर तो डर कैसा 

इन्हीं के बीच में खिलता गुलाब होता है

 

धरम के नाम पे मिलकर रहें तो अच्छा है

धरम के नाम पे लड़ना खराब होता है

 

हमारे मुल्क ने अब्दुल हमीद को जन्मा   
तुम्हारे मुल्क में अजमल कसाब होता है

----------------------------------------------------

 ( मौलिक व अप्रकाशित )

 

 

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Comment

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Comment by Sachin Dev on February 5, 2016 at 1:24pm

आ. भाई मिथलेश वामनकर जी गजल पर आपकी उपस्तिथि और अनुशंषा से बहुत उत्साहवर्धन हुआ साथ ही आ. समीर जी के सुझावों को गजल मैं आत्मसात करने का प्रयास रहेगा ! हार्दिक धन्यवाद आपका ! 

Comment by Sachin Dev on February 5, 2016 at 1:22pm

आ. भाई सतविंदर कुमार जी आपका हार्दिक आभार उत्साहवर्धन के लिए ! 

Comment by Sachin Dev on February 5, 2016 at 1:21pm

आ. समीर कबीर जी गजल पर आपका प्रोत्साहन पाकर बहुत प्रसन्नता हुई और गजल मैं सुधार बाबत आपके बहुमूल्य सुझावों को दिल से स्वीकार करते हुए आपका हार्दिक आभार , ऐसे ही मार्गदर्शन और प्रोत्साहन की अपेक्षा सहित ! 

Comment by Sachin Dev on February 5, 2016 at 1:19pm

आ. नादिर खां साहब गजल पर आपके प्रोसाहन के लिए हार्दिक आभार आपका ! 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 4, 2016 at 11:09pm

शानदार जानदार जबरदस्त 

आदरणीय सचिन भाई जी, कमाल की ग़ज़ल हुई है, बस उस्ताद जी की इस्लाह पर गौर कीजिये, ग़ज़ल लाजवाब हो जायेगी. इस ग़ज़ल पर दिल से दाद ओ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं. सादर 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 4, 2016 at 6:14pm
तारीफ़ करने को लफ्ज़ पड़ते कम
आपका हर शेर लाज़वाब होता है।
Comment by Samar kabeer on February 4, 2016 at 5:56pm
जनाब सचिन देव जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं !
कुछ बातों की तरफ़ ध्यान दिलाना चाहूंगा,दूसरे शैर का सानी मिसरा इस तरह करना उचित होगा ?
"कि उसके पास तो सबका जवाब होता है"
चोथे शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ का दोष है,देखियेगा !
आख़री शेर का ऊला मिसरा इस तरह करना उचित होगा:-
"हमारे मुल्क ने अब्दुल हमीद को जन्मा",क्योंकि सही नाम "अब्दुल हमीद"है इसे हमीद अब्दुल नहीं कहा जासकता !
Comment by नादिर ख़ान on February 4, 2016 at 5:49pm

हमारे मुल्क ने जन्मा हमीद अबदुल को  
तुम्हारे मुल्क में अजमल कसाब होता है.....

आदरणीय सचिन जी बहुत खूब कहा  सच भी है, मिट्टी मिट्टी में फर्क बेहिसाब होता है |

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