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ग़ज़ल.................जान' गोरखपुरी

122 122 122 122

अजब इक तमाशा है ये ज़िन्दगी भी।
बिछड़ना है सबकुछ मगर दिल्लगी भी।।

बहुत बेमुरव्वत है तासीर दिल की।
मिली जितनी उतनी बढ़ी तिश्नगी भी।।

जमीं हो या आँखें...ख़ुशी हो या हो गम।
है अच्छी नही देर तक खुश्कगी* भी।। (सूखापन)

कहानी मुहब्बत की है तो पुरानी।
नयी सी मगर इसमें है ताजगी भी।।

न समझा कोई हुस्नो-इश्को-वफ़ा पर।
हरिक को है पर इनसे बावस्तगी* भी।। (सम्बद्धता)

ये माना कि बरबादियाँ भी बहुत की।
मगर दुनिया को दी है शाइस्तगी* भी।। (शिष्टता/सभ्यता)

मेरा दिल भी बच्चे का दिल हो कि जैसे।
है पल में हँसे पल में अफ़सुर्दगी* भी।। (उदासी)

दिले-बेकरॉ* मुफ़्त पाया; है माँगे.. (असीमित दिल)
वो अब साथ खूने-जिगर चश्मगी* भी।। (मुँहदिखाई)

मैं हूँ सिर्फ तेरा ये सुनकर कहे है..
तेरी ज़िन्दगी है कोई ज़िन्दगी भी?

हूँ दुनिया में मशहूर इनायत से तेरी।
बड़े काम की शय है आवारगी भी।।

करम कैसे हो "जान" उसका?जो तुझसे..
सर अपना झुकाके न हो बन्दगी भी।।

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Krish mishra on November 23, 2015 at 6:30pm
हार्दिक आभार आ.शिज्जू सर।
Comment by Krish mishra on November 23, 2015 at 6:29pm
बेहद शुक्रिया आ.मिथिलेश सर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on November 23, 2015 at 12:50pm
बहुत बढ़िया कृष्ण मिश्रा जी बेहतरीन ग़ज़ल हुई है

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 23, 2015 at 10:09am
आदरणीय कृष्ण भाई जी बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है दिल से दाद कुबूल फरमाएं।
Comment by Krish mishra on November 20, 2015 at 3:30pm
बेहद शुक्रिया आ.गिरिराज सर।ग़ज़ल आपको पसंद आई जानकर आस्वस्त हुआ।हार्दिक आभार आ.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 20, 2015 at 7:46am

प्रिय अनुज , बहुत बढ़िया गज़ल कही है , दिल से बधाइयाँ स्वीकार करें , ये दो शेर खूब पसंद आये ॥
बहुत बेमुरव्वत है तासीर दिल की।
मिली जितनी उतनी बढ़ी तिश्नगी भी।।

जमीं हो या आँखें...ख़ुशी हो या हो गम।
है अच्छी नही देर तक खुश्कगी* भी।।

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