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ग़ज़ल- सारथी || इन्तिज़ार इन्तिज़ार है तो है ||

इन्तिज़ार इन्तिज़ार है तो है 

ऐतबार ऐतबार है तो है /१

मैं हूँ नादाँ अगर तो, हूँ तो हूँ 

वो अगर होशियार है तो है /२ 

छोड़कर मुझको सिर्फ़ इक वो चाँद 

हिज़्र का राज़दार है तो है /३  

कल वो हँसता था मेरी हालत पर 

वो भी अब बेक़रार है तो है /४ 

दीद का लुत्फ़ हो गया हासिल 

अब नज़र कर्ज़दार है तो है /५ 

...........................................
सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित

अरकान: २१२२ १२१२ २२ 

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Comment

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Comment by Baidyanath Saarthi on November 5, 2015 at 3:42pm

आदरणीय  laxman dhami जी, आदरणीय  गिरिराज भंडारी जी और आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी , आप महानुभावों का भूयस आभार , हृदयतल से आभार ! प्रोत्साहन हेतु सादर प्रणाम स्वीकार करें ! आपका ही - सारथी :)

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 4, 2015 at 11:25am

आ० भाई सारथि जी इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए कोटि कोटि बधाई l


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 3, 2015 at 6:35pm

प्रिय अनुज बैद्यनाथ , कठिन रदीफ ले कर एक अच्छी गज़ल कही है , दिली बधाइयाँ स्वीकार करें ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 3, 2015 at 12:50pm

आदरणीय सारथी जी बहुत बेहतरीन ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद और मुबारकबाद कुबूल फरमाएं 

कृपया ध्यान दे...

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