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           "क्या मम्मी आप भी जरा-जरा सी बातों पर तुनक पड़ती हो,पूरा आसमान सिर पर उठा लेती हो.पापा के दोस्तों के बीच में ही तो थीं आप   वे लोग कोई जानवर तो नहीं,हँसी-मजाक ही तो किया चीर हरण तो नहीं.."सुनकर खून उतर आया था उसकी आँखों में,अपनी ही लाठी,अपने पर वार,तिलमिलाते हुए पलकें बंद कर ली तो दर्द आंसू बन बह निकला.वह सोचने लगी,

     'उम्र की पहली फसल बाबा की अँगुलियों में अटक गई,सतरंगी सपने उड़े भी न थे कि उम्र की दूसरी फसल बिन हवा-पानी घूँघट में उजड़ गई और तीसरी को तो चौराहे पर ही चरने के लिए रख दी गई और अब तो उम्मीद की चौथी फसल भी हाथ से फ़िसल गई.'मन ही मन वह बुदबुदाई "अपनी ही बिछाई बिसात है, अपने ही मोहरों से पिटना -उजडना युगों का इतिहास है.अत;अब भी सांस लेनी सूरज के अंत तक.  

    { मौलिक एवंम अप्रकाशित रचना }

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Comment by Janki wahie on November 1, 2015 at 5:40pm
अद्भुत प्रतीकात्मक ,कथा बधाई।
Comment by savitamishra on November 1, 2015 at 3:26pm

बहुत सुन्दर कल्पना में ढाला आपने जिंदगी के चार पढ़ाओ को...जैसा कि हम दो बार पढ़ फिर समझे ..गलत समझे या सही पता न...सादर _/\_

Comment by asha jugran on November 1, 2015 at 3:10pm

बहुत-बहुत शुक्रिया कल्पना जी उत्साह वर्धन के लिए..आभार.

Comment by asha jugran on November 1, 2015 at 3:08pm

बहुत-बहुत धन्यवाद नीता जी,आपके शब्द उर्वरक का कार्य करते हैं...आभार.

Comment by asha jugran on November 1, 2015 at 3:05pm

हार्दिक आभार आद० कांता जी रचना को समय देने और समीक्षात्मक टिपण्णी देने के लिए.

Comment by Nita Kasar on November 1, 2015 at 1:43pm
अपनी ही बेटी के लिये माँ का इतना आहत होना चिंताजनक है ये पीढ़ी नयी हवा ही क़सूरवार है ये संस्कारों की सौग़ात कदाचित नही,संगत का असर है।माँ ने भी तो ये समय निकाला है ।माँ के मन की पीड़ा की सुंदर अभिव्यक्ति बधाई आद०आद०आशा जुगरान जी ।
Comment by kanta roy on November 1, 2015 at 12:03pm

वाह !!! नारी जीवन की विसंगति को आपने ये कितनी गूढ़ता से सजीव चित्र दे दिया है आदरणीया आशा जी ,पढ़ते ही मेरा मन भी तिलमिला उठा।  दार्सनिक भाव में अदभुत चित्रण।  बधाई स्वीकार करें। 

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