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इंसानी फ़ितरत – ( लघुकथा ) –

इंसानी फ़ितरत – ( लघुकथा )  –

"हे पवन देव ,कृपया मेरी  सहायता कीजिये"!आम के वॄक्ष ने कराहते हुए कहा

“क्या हुआ  बन्धु, कोई कष्ट है क्या"!

"क्या आप नहीं देख रहे, यह उदंड मानव झुंड, पत्थर मार मार कर मुझे घायल कर रहा हैं"!

"तो इसमें मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूं"!

"आप अपने वेग से मुझे झकझोर कर मेरे फ़लों को नीचे गिरा दीजिये ताकि यह  संतुष्ट होकर,  पत्थर प्रहार बंद कर दें"!

"तुम बहुत भोले हो मित्र, ऐसा कुछ भी नहीं होगा,ये इंसान  हैं"!

"आपके इस कथन का आशय क्या है,स्पष्ट रूप से बताइये "!

"देखो मित्र,तुम्हारे पास अन्य जो भी प्राणी जैसे कीडे,मकोडे, पशु, पक्षी आदि आते हैं तो वे तुम्हारे  फ़ल, फ़ूल, पत्ते इत्यादि उतना ही लेते हैं जितनी उन्हें भूख या ज़रूरत  होती है"!

"हॉ, यह तो सत्य है"!

"मगर यह जो इंसान है,यह सदैव पेट से ज्यादा घर भरने की लालसा रखता है, भले ही वह वस्तु घर में पडे पडे नष्ट हो जाय"!

"पर ऐसा क्यों करता है इंसान"!

"यही इंसानी  फ़ितरत है"!

 मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on September 23, 2015 at 11:46am

हार्दिक आभार आदरणीय शेख शहज़ाद उसमानी जी ,डॉ विजय शंकर जी, आप लोगों ने लघुकथा को समय दिया, उसकी सराहना की तथा  सकारात्मक विवेचना की, साथ ही मेरा उत्साह वर्धन किया!पुनः आभार!

Comment by Dr. Vijai Shanker on September 23, 2015 at 10:17am
इंसानी फ़ितरत तो यही है , खाता कम है , समेटता अधिक है। …… उससे भी अधिक यह है कि हर चीज़ की तिजारत करता है , गज़ब तो यह है कि हुकूमतें भी तिजारती हो गयी हैं। क्या पेड़ , क्या उसके फल।
बहुत बहुत बधाई , इस प्रस्तुति पर , आदरणीय तेज वीर सिंह जी , सादर।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 23, 2015 at 10:10am
वाह... इन्सानी फ़ितरत को उत्कृष्ट लघु कथा के माध्यम से विस्तार से समझने को उकसाया है आपने।तहे दिल बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ आदरणीय Tej Veer Singh जी।

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