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12112 12112 12112 12112
पलट के फिर आयेंगी वो महक सबा वो सहर कभी न कभी
उदास न हो कि होगा हर इक दुआ का असर कभी न कभी

ये राह बहुत तवील सही, तू तन्हा ओ बेक़रार सही
मगर तुझे याद आयेगी ये घड़ी ये सफ़र कभी न कभी

यूँ हाथ के आबलों पे न जा, ज़बीं से टपकती बूंदें न देख
दिखेगा ज़रूर दुनिया को भी, तेरा ये हुनर कभी न कभी

पिघलने लगेंगे संगे-महक, तेरे तबो-ताब से किसी दिन
निकाल के लायेंगे यही पत्थरों से नहर कभी न कभी

फ़लक़ ये ज़मीन आबो हवा, किसी की ये मिल्कियत तो नहीं
यक़ीं है मुझे कि आयेगा सच सभी को नज़र कभी न कभी

(संगे महक= कसौटी का पत्थर)

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Ravi Shukla on September 22, 2015 at 2:40pm

आदरणीय शिज्‍जू जी आदाब

आपकी ग़ज़ल की बह्र हमारे लिये नई है इसलिये अभी तो इसके कथ्‍य का लुत्‍फ उठाया है हमने

ग़ज़ल के लिये दिली दाद कुबूल करें

बह्र के निमार्ण, नियम और इसके विषय में अधिक जानकारी  दें सके तो हमारे बहुत सारे सवाल हल हो सकेगे । मंच पर सारे लेख पढ़ चुके है । सादर ।

Comment by मनोज अहसास on September 22, 2015 at 10:00am
इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए सबसे पहले बधाई
आदरणीय शकूर साहब
सादर

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