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धर्मान्धों की नगरी में (ग़ज़ल)

बह्र : २२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २

 

इंसाँ दुत्कारे जाते हैं धर्मान्धों की नगरी में

पर पत्थर पूजे जाते हैं धर्मान्धों की नगरी में

 

शब्दों से नारी की पूजा होती है लेकिन उस पर

ज़ुल्म सभी ढाये जाते हैं धर्मान्धों की नगरी में

 

नफ़रत फैलाने वाले बन जाते हैं नेता, मंत्री

पर प्रेमी मारे जाते हैं धर्मान्धों की नगरी में

 

दिन भर मेहनत करने वाले मुश्किल से खाना पाते

ढोंगी सब खाये जाते हैं धर्मान्धों की नगरी में

 

आँख मूँद जो करें भरोसा सच्चे भक्त कहे जाते

बाकी सब कोसे जाते हैं धर्मान्धों की नगरी में

 

गली गली अंधेर मचा है फिर भी जन्नत की ख़ातिर

सारे के सारे जाते हैं धर्मान्धों की नगरी में

------------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 583

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 20, 2015 at 10:21pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय विजय निकोर जी

Comment by vijay nikore on September 13, 2015 at 1:16pm

 काफ़िया और रदीफ़ दोनो ही खूबसूरत । बधाई।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 11, 2015 at 11:43am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय गिरिराज जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 11, 2015 at 11:42am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय समर कबीर जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 11, 2015 at 11:41am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय विजय शंकर जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 11, 2015 at 11:41am
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय शिज्जू जी
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 11, 2015 at 11:39am

शुक्रिया आदरणीय श्याम नारायण जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 11, 2015 at 11:38am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय रवि जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 11, 2015 at 11:37am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय दिनेश जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 11, 2015 at 11:37am
आदरणीय मिथिलेश जी, बहुत बहुत शुक्रिया

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