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गुलाबी जिल्द वाली डायरी [कविता ]

वो थी एक डायरी

गुलाबी जिल्द वाली

अन्दर के चिकने पन्ने

खुशनुमा छुअन लिए

मुकम्मल थी एकदम

कुछ खूबसूरत सा

लिखने के लिए I

 

सिल्क की साड़ियों की

तहों के बीच,

अल्मारी में सहेजा था उसे   

उन मेहंदी लगे हाथों ने,  

सेंट की खुशबू

और ज़री की चुभन

 को   करती रही थी वो  जज़्ब,

हर दिन रहता था      

बाहर आने का  इंतज़ार 

अपने चिकने  पन्नों पर

प्यारा सा कुछ

लिखे जाने का इंतज़ार I

 

 

अल्मारी  के बाहर

मौसम बदलते रहे

 साड़ियो की तहों में दबी        

डरी सहमी 

वो सुनती रही,

 चिल्लाना रोना बिलखना

और अल्मारी के अन्दर

साड़ियों की रंगत

भी फीकी पड़ती रही,   

और वो गुलाबी जिल्द वाली डायरी

जिसके चिकने पन्नों

में थी खुशनुमा छुअन

 मेहंदी लगे हाथों की

राह तकती रही I

 

कितने मौसम बदले यूं ही  

आज  उसे याद नहीं,

साड़ियों की क़ैद

जिल्द की गुलाबी रंगत

 पन्नों की खुशनुमा छुअन

सब बिसरी बातें हैं अब,

खुरदुरे हाथ लिखते हैं उसमे  

खर्चे का जमा घटा

न कोई ख्वाइश न शिकायत

न  कोई  इंतज़ार बचा

अब वो है  एक  

बिना जिल्द वाली

फटेहाल पुरानी  डायरी

 

मौलिक व् अप्रकाशित

Views: 1341

Comment

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Comment by pratibha pande on August 25, 2015 at 8:38am
आ० मिथिलेश जी मेरे प्रयास पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 22, 2015 at 5:16pm

आदरणीया प्रतिभा जी, गुलाबी जिल्द वाली डायरी के बिना जिल्द वाली डायरी बनने की दास्तां को मुकम्मल लफ्ज़ मिले है. एक नारी के समर्पण की मार्मिक कथा को बिम्ब के माध्यम से जिस सधे ढंग से प्रस्तुत किया है वो अद्भुत है. इस शानदार प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 22, 2015 at 4:21pm

गुलाबी डायरी पूरा जीवन दर्शन बयां करती है. आपको बधाई .

Comment by pratibha pande on August 21, 2015 at 8:30pm

आ० हर्ष जी दाद के लिए तहे दिल से शुक्रिया साथ में ढेरों बधाई भी ,माह का सक्रीय सदस्य चुने  जाने के लिए

Comment by Harash Mahajan on August 21, 2015 at 8:03pm
आ0 प्रतिभा पाण्डेय जी बहुत ही सूंदर कविता । दाद !!
Comment by pratibha pande on August 21, 2015 at 10:07am

आ० कांता जी, पूरा ही पोस्ट मोरटम कर दिया आपने बेचारी छोटी सी डायरी का.  क्या ,टूटने के डर से ख़्वाब बुने ही न जाएँ ? ,   आपकी अपनेपन से पगी टिपण्णी के लिए ह्रदय से  आभार  

Comment by kanta roy on August 21, 2015 at 8:50am
सपनों की वो गुलाबी डायरी ... जिसके पन्ने रेशम से थे जिसकी चमक निराली थी । राह तकना उसका मेहंदी भरी हाथों से कुछ गुलाबी से दिन रात की बातों को लिखे जाने का । वो भी मासूम था आपकी ही तरह । जीवन के कटु सत्य को भूलकर एक ख्वाब देख लिये थे उसने भी । ख्वाब का गुलाबी और मुलायम होना ख्वाबों तक ही तो सीमित होते है ,इसलिए कहते है कि देर तक ना सोया करो ,देर तक सोने में ख्वाब पलने लगते है । ख्वाब का पलकर फिर टूट जाना उस खुरदरे हाथों से और गुलाबी जिल्द का रेशमी एहसास घुल जाना जीवन की सख्त लम्हों में .... सच में ये अच्छा नहीं होता है आदरणीया प्रतिभा जी । वो गुलाबी डायरी का पन्ना कहीं मेरी ही ख्वाबों वाली बात तो नहीं थी जो आपको भी अपनी सी लगी हो । तेरी मेरी एक कहानी है ये सब सपनों की कहानी । बधाई अापको ।

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