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ग़ज़ल- हमारा दिल जलाकर आँख का काजल बनाती है।

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
हमारा दिल जलाकर आँख का काजल बनाती है।
बडी जालिम है' पलकों पर मे'री बादल बनाती है।

निगाहे गर्म वो उसकी मसीहा भी है' कातिल भी।
कभी मरहम लगाती है कभी घायल बनाती है।

महकता है चमन सारा तुम्हारे तन की' खुशबू से।
तुम्हारी ही नकल से शाखे गुल कोंपल बनाती है।

जहाँ सहरा बनाया है खुदा तेरे फरिश्तों ने।
वहाँ उस शख़्स की मौजूदगी जंगल बनाती है।

हवा तेरा बदन छूकर अगर छू ले किसी को फिर।
ते'रा आशिक बनाती है ते'रा कायल बनाती है।

मुझे सुनने में' आया हैं ते'री जाने जिगर 'राहुल'।
तुझे उल्फत नहीं करती फकत पागल बनाती है।

मौलिक व अप्रकाशित ।

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Comment by maharshi tripathi on July 22, 2015 at 10:24pm

इस खूबसूरत गजल पर दाद कुबुलें आ. Rahul Dangi जी |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 22, 2015 at 9:12pm

आदरणीय राहुल भाई जी, बढ़िया ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर दाद हाज़िर है.

Comment by Rahul Dangi Panchal on July 22, 2015 at 9:03pm
जनाब समर कबीर साहब आपकी टिप्पणी ने ग़ज़ल को पूर्ण कर दिया बहुत बहुत आभार आदरणीय
Comment by Rahul Dangi Panchal on July 22, 2015 at 9:02pm
शुक्रिया आदरणीय आनन्द जी
Comment by Samar kabeer on July 22, 2015 at 6:33pm
जनाब राहुल डांगी जी,आदाब, वाह वाह वाह,बहुत ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
Comment by Er Anand Sagar Pandey on July 22, 2015 at 5:39pm
बहुत ही उम्दा राहुल जी l
मजा आ गया l
Comment by Rahul Dangi Panchal on July 22, 2015 at 12:22pm
आदरणीय मनोज भाई जी शुक्रिया । काफिया अल पर ठहराया है आगे गुनीजनों की राय का इन्तजार करते है
Comment by मनोज अहसास on July 22, 2015 at 12:09pm
सर
बहुत खूब
शानदार
बस एक जिज्ञासा है
के काफ़िया जंगल और कोपल उचित है या नहीं
थोडा समाधान कर दें

कृपया ध्यान दे...

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