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"हैलो रवि, घरवालों ने मेरी शादी तय कर दी है। प्लीज मुझे यहाँ से निकल ले चलो। मैं मंगलसूत्र पहनूंगी तो तुम्हारे हाथों से वरना अपनी जान दे दूंगी।"
"सुजाता, पागल मत बनो। यही तो बढिया मौका है अपने पास....."
"क्या मतलब?"
"अरे, हम अपनी जिंदगी की शुरुआत करेंगे लेकिन तुम्हारी शादी के बाद। तुम दोनों तरफ का माल समेट लेना। शादी के अगले दिन जब तुम मिलनी पर आओगी। मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊँगा। फिर दोनों मिलकर ऐश करेंगे ऐश।"
प्यार में पागल हुई सुजाता ने पूरी प्लानिंग के साथ काम किया और शादी के अगले दिन शाम को सबसे छुपकर रवि के पास बस स्टैंड पर पहुँच गई।
"रवि, मैं तुम्हारे लिए सबकुछ छोड़कर आ गई हूँ।"- सुजाता ने दोनों हाथ फैला दिए लेकिन रवि की नजरें जेवरों वाले बैग पर ही टिकी हुई थीं। यह देखकर सुजाता को अपने अंदर कुछ टूटने का एहसास सा हुआ। एक झटका सा लगा जैसे बरसों की नींद से जाग गई हो। उल्टे पैर वापस मुड़ गई।
"क्या हुआ सुजाता......?"
"रवि, पहला प्यार ही सच्चा और आखिरी नहीं होता है।"

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on July 20, 2015 at 5:35pm

अच्छी लघुकथा , कोई प्यार का दीवाना , कोई पैसे का | बधाई आदरणीय.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 19, 2015 at 10:04pm

आदरणीय विनोद जी बढ़िया लघुकथा हुई है. इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

Comment by TEJ VEER SINGH on July 19, 2015 at 10:01am

आदरणीय विनोद जी,आधुनिक प्यार पर करारा व्यंग!हार्दिक बधाई!

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 18, 2015 at 11:29pm

प्यार होता भी है या नही , ख़ैर  रिश्ते अब बेमानी हैं . 

बढ़िया कथा , सचेत करती हुई , बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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