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दोहा गीत (एक प्रयास)

मनुज रूप मैं पा गया,

हुआ स्वप्न साकार

 

 

कोमल किरणे भोर की,

बिखराती जब नेह है,

दिखती उल्लासित धरा

आन्दंदित हर देह है.

 

सचमुच एक सराय सा

लगा मुझे संसार

 

प्यार भरे व्यवहार से

मिलती देखी जीत है,

बना एक अनजान जब,

मेरे मन का मीत है

 

सच्ची निष्ठा ने किया,

हरदम बेडा पार

 

लोभ मोह माया कपट,

सारे लगते काल हैं,

सत्य यहाँ है मौत ही,

बाकी सब जंजाल हैं.

 

परम पिता का शुक्रिया

और नमन हरबार.

 

 

मौलिक/अप्रकाशित.

 

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on July 9, 2015 at 6:29pm

आदरणीय  प्रदीप कुमार सिंह  कुशवाहा  साहब  सादर  प्रणाम,  आपका  दोहा  तो  बहुत  उत्तम रचा  है. सच  कहा  नयी  विधा है  मैं तो  प्रथम  ही  इस पर  रचना कर रहा हूँ. उदाहरण अवश्य  पुराने  देखने  मिले  हैं. आपकी  छंदात्मक प्रतिक्रिया के  लिए  बहुत-बहुत  आभार. सादर.

Comment by Rahul Dangi Panchal on July 9, 2015 at 10:39am
बहुत सुन्दर गीत आदरणीय बधाई स्वीकार करें

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 9, 2015 at 10:28am

वाह  वाह  अद्दभुत प्रयोग आ० अशोक कुमार रक्ताले जी ,पर एक बात समझ नहीं आई आपने सम चरण में देह है ,जीत है ,काल है जंजाल है ---इन सब में है एड करने की क्या आवश्यकता थी उसके बिना भी गीत प्रवाह में है मुझे तो ऐसा ही लग रहा है ,आपको इस सुन्दर प्रस्तुति के लिये दिल से बधाई. 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 9, 2015 at 9:57am

भाव युक्त दोहे रचे , दिया गीत का मान

नयी लगी मुझको  विधा , स्वीकारें सम्मान .....

आदरणीय Ashok Kumar Raktale  जी , सुबह - सुबह परतं रचना पढ़ी , शुभ प्रभात . मेरे दोहे में मात्र देख लीजियेगा . सादर 

बधाई 

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