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गजल--मेरी किस्मत के पन्नों में कोई हरकत नहीं दिखती।

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
बहुत दिन हो गये अब भी कहीं राहत नहीं दिखती।
मे'री किस्मत के' पन्नों में को'ई हरकत नहीं दिखती।।
***
सभी मन्दिर में' मस्जिद,चर्च में दिल ले के' भटका हूँ।
किसी मजहब में' दुनिया के मुझे कुदरत नहीं दिखती।।
***
ते'री फुरकत के' तीरों ने किया हैं आश तक घायल।
मुझे अफसोस है तुझको मे'री हालत नहीं दिखती।।
***
सनम इक जख़्म रो रो कर बडी जिद करता' है मुझसे।
कहाँ से ला के' दूँ तुझको इसे गुरबत नहीं दिखती।।
***
हमारी जे़ब में सोने का' इक सिक्का नहीं है और।
मुहब्बत की जमाने में को'ई कीमत नहीं दिखती।।
***
तुम्हारे ख़त के' इक कोने में' बैठा रो रहा हूँ मैं।
किसी भी शब्द के लब पर मुझे चाहत नहीं दिखती।।
***
वफा से आज 'राहुल' जो जरा सा हट के' देखा तो।
समझ आया कि क्यूं उसको मे'री जिल्लत नहीं दिखती।।

मौलिक व अप्रकाशित ।

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Comment

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Comment by Rahul Dangi Panchal on July 8, 2015 at 2:08am
आदरणीय Saurabh Pandey जी आपकी टिप्पणी बहुत ही उत्साहवर्धक है। बस यूं ही स्नेह बनाए रखें और मुझ जैसे नौसिखिया का मार्ग दर्शन करते रहें। जब कमीयों का पता चलता है तब ही कोई सीख पाता है। सादर आभार ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 8, 2015 at 1:35am

आप बहर में कह रहे हैं और भाव निभ रहे हैं यह कम बड़ी बात नहीं ! भाई राहुल जी ऐसे अभ्यास का क्रम बना रहे

हार्दिक शुभेच्छाएँ.

Comment by Rahul Dangi Panchal on July 1, 2015 at 8:32pm
आदरणीय कान्ता राय जी गजल के भाव को समझने हेतु दिल की तह से शुक्रिया ।
Comment by kanta roy on July 1, 2015 at 8:22pm
ते'री फुरकत के' तीरों ने किया हैं आश तक घायल।
मुझे अफसोस है तुझको मे'री हालत नहीं दिखती।।.....वाह !!!!! हर शेर दिल को चीर जाते है ....लाजवाब गजल लिखी है आपने
Comment by Rahul Dangi Panchal on June 29, 2015 at 6:56pm
आदरणीय धर्मेन्द जी शुक्रिया
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 29, 2015 at 6:21pm

अच्छी ग़ज़ल के बधाई स्वीकारें

Comment by Rahul Dangi Panchal on June 29, 2015 at 2:00pm
आदरणीय मनोज भाई जी शुक्रिया । पुलिस की नौकरी से टाइम निकालना बहुत ही मुश्किल है। आदरणीय बस किस्तों में लिखता हुँ । एक शे'र आज एक कल ।
Comment by मनोज अहसास on June 29, 2015 at 1:27pm
वाह वाह वाह
बस ये बता दीजे सर
के बहर और ड्यूटी एक साथ कैसे साध लेते है
बहुत खूब
सादर
Comment by Rahul Dangi Panchal on June 29, 2015 at 10:33am
आदरणीय गिरीराज जी से विन्रम निवेदन है । क्रपया एक बार पुन: अवलोकन करें सादर
Comment by Rahul Dangi Panchal on June 28, 2015 at 6:57pm
किसी भी शब्द में तेरे मुझे उल्फत नहीं दिखती।।

की जगह क्या यह ठीक रहेगा। किसी भी शब्द के लब पर मुझे उल्फत नहीं दिखती।।

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