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वफ़ाओं का अपनी सिला चाहता हूँ

फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन

वफ़ाओं का अपनी सिला चाहता हूँ
ख़रीदो मुझे मैं बिका चाहता हूँ

मिरी ज़िन्दगी तो हुई ख़त्म,बेटे
मैं तेरे लिये सोचना चाहता हूँ

मुझे रोक लेती हैं मासूम कलियाँ
मैं ख़ुद से अगर भागना चाहता हूँ

मुझे उनकी ख़ुश्बू से महकाए रखना
मैं क्या तुझ से बाद-ए-सबा चाहता हूँ

लगाते हो क्यूँ दैर-ओ-मस्जिद प ताले
ख़ुदा का हर इक घर खुला चाहता हूँ

छियालीस डिग्री से ऊपर है गर्मी
मैं सावन की ठंडी हवा चाहता हूँ

"समर" अब ये क़िस्सा यहीं ख़त्म कर दो
सिफ़ारिश मैं तुम से किया चाहता हूँ

"समर कबीर"
मौलिक /अप्रकाशित

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Comment by Md. Anis arman on January 19, 2019 at 11:16am

जी सर समझ में आ गया  ,आपका बहुत बहुत शुक्रिया |

Comment by Samar kabeer on January 18, 2019 at 5:27pm

जनाब अनीस शैख़ साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

क़वाफ़ी 'आ' स्वरांत हैं इसलिए लिया जा सकता है,मतले में क़वाफ़ी हैं 'ला' और "का"

Comment by Md. Anis arman on January 18, 2019 at 4:15pm
  • समर सर आदाब बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए,  इस ग़ज़ल का मतला  पढ़ के एक सवाल दिमाग़ में उठ रहा है, मुझे ये भी यकीन है कि आपने लिखा है तो ऐसा ही होता होगा ,फिर भी आप से सीखना चाहता हूँ ,सर ग़ज़ल में आ स्वरांत काफिआ है मतले में  सिला और बिका लफ्ज़ लिया गया है इसमें इ आ स्वर साथ आ रहे ,तो क्या स्वरांत के हर्फ़ अलग अलग हों तो उसके पहले हम एक जैसी मात्रा ले सकते हैं |
Comment by Samar kabeer on September 25, 2017 at 10:16pm
जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,आपने पूरानी यादें ताज़ा कर दीं, ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Mahendra Kumar on September 25, 2017 at 8:59pm

वफ़ाओं का अपनी सिला चाहता हूँ
ख़रीदो मुझे मैं बिका चाहता हूँ ...वाह! क्या ख़ूब मतला है.

मुझे रोक लेती हैं मासूम कलियाँ
मैं ख़ुद से अगर भागना चाहता हूँ  ...ज़बरदस्त शेर.

आ. समर सर, इस ख़ूबसूरत ज़मीन पर बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए आपको दिल से ढेर सारी बधाई. सादर.

Comment by Samar kabeer on June 3, 2015 at 11:49pm
जनाब निलेश "नूर" जी,आदाब,हा हा हा, पांच शैर की अगर एक ग़ज़ल मानी जाए तो मेरी 10 ग़ज़लें तो हो गई हैं,पहली 10 ,दूसरी 21 ,तीसरी 7 सात और कुछ मुतफ़र्रिक़ अशआर सब मिलाकर 50 शैर यानी 10 ग़ज़लें,ग़ज़ल में आपकी शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 3, 2015 at 2:44pm

बहुत ख़ूब ...लगता है इस रदीफ़ काफ़िये पर अलग अलग भावों से भरी ८-१० ग़ज़लें कह के ही मानेंगे आप..
ये ग़जल भी बहुत उम्दा है..बधाई 

Comment by Samar kabeer on June 1, 2015 at 10:28pm
जनाब डॉ आशुतोष मिश्रा जी, आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 1, 2015 at 10:27pm
आली जनाब डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Samar kabeer on June 1, 2015 at 10:23pm
जनाब वीनस केसरी जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

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