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टपकती टोंटियाँ (लघु कथा)// शुभ्रांशु पाण्डेय

चटक धूप. आसमान में उड़ते-उड़ते गला सूख गया था. पानी की एक बूँद कहीं नजर नहीं आ रही थी. पानी या तो बोतलों में बन्द था या  वहाँ स्वीमिंग पूल में था , लेकिन स्वीमिंग पूल के ऊपर लगी जाली के कारण पाना सम्भव नहीं था.

इस प्रचंड गर्मी में सजे-धजे साफ़-सूथरे शहर में प्यास से व्याकुल चिडियों को खसर-खसर करते वो चापाकल, उनके किनारे की खुली नालियाँ, लगातार टपकती म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की टोटियों की बहुत याद आ रहीं थी.

(मौलिक और अप्रकाशित)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 28, 2015 at 2:09am

इस लघुकथा के माध्यम से आजके विकास का अत्यंत ही असंवेदनशील चेहरा सामने आया है. समस्या को समुचित संवेदना के साथ उठाती इस लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई.
शुभ-शुभ

Comment by Shubhranshu Pandey on May 27, 2015 at 9:56am

आदरणीय गणेश भैया,

कथा पर आने के लिये आभार.

सादर.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 26, 2015 at 5:29pm

विकास के इस दौड़ में कई चीजे भूलती जा रहीं हैं, एक अति महत्वपूर्ण मुद्दे पर ध्यान आकृष्ट कराती हुई अच्छी कथा हुई है, बहुत बहुत बधाई.

Comment by Shubhranshu Pandey on May 24, 2015 at 10:23pm

आदरणीय डा आशुतोष जी, 

घर की छत पर रखा एक प्याला जल इस नकारात्मक विचार का समाधान है. अगर हर घर के छत पर ये प्याला भरा हो तो आपके यहां नहीं लेकिन कहीं तो ये प्यासे जल पीयेंगे ही. कथा पर आने के लिए आभार.

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on May 24, 2015 at 10:19pm

आदरणीय श्री सुनील जी, 

शहर का मतलब ही व्यवसाय का केन्द हैं. यहां कई बातों के लिये प्रयास किये जाते हैं. स्वाभाविक रुप से मिलने वाली चीज को भी दुरुह बना दिया जाता है. 

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on May 24, 2015 at 10:16pm

आदरणीय विनय जी, 

उन टपकटी टोटियों के सहारे चिडियां ही नहीं कई जानवर अपनी प्यास बुझा लिया करते थे. 

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on May 24, 2015 at 10:14pm

आदरणीय गोपाल नारायण जी, 

प्लास्टिक के बन्द ढक्कनों ने मानवता के ढक्कन को भी बन्द कर दिया है. अब होटल वाले पानी देने के बदले बोतल बेचने का प्रयास ज्यादा करते हैं. 

सादर.

Comment by Shubhranshu Pandey on May 24, 2015 at 10:10pm

आदरणीय श्याम नारायण जी, 

कथा पर आने के लिये आभार.

सादर.

Comment by kanta roy on May 24, 2015 at 12:43pm
वाह !!! बहुत ही सुंदर चित्रण पानी की प्यास का ...... प्यासा पंछी शहरीकरण में कहीं मर रहा है ...... सुंदर और साफ शहर कब असहायों का रहा है .... स्वीमिंग पूल की जालियाँ .... पोखर कुओं की विलुप्तता .... कहाँ लेकर जायेगी हमें । बधाई स्वीकार करे आदरणीय शुभ्रांशु पाण्डेय जी
Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 24, 2015 at 12:30pm

आदरणीय शुभ्रांशु जी ..चिड़िया क्या हर जीव याद कर रहा है वो मंजर ..सच में बिनाश का ही समय आ गया है ..सोचने के लिए प्रेरित करती इस शानदार लघु कथा के लिए तहे दिल बधाई सादर 

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