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ख़ुद ही देखी है किसी को न दिखाई मैंने

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन/फ़इलुन

ख़ुद ही देखी है किसी को न दिखाई मैंने
तेरी तस्वीर तसव्वुर से बनाई मैंने

ख़ाक पड़ जाएगी कितने ही हसीं चहरों पर
आईने से जो कभी गर्द हटाई मैंने

मुझको पाबंदियाँ ओरों की गवारा ही नहीं
ख़ुद ही अपने लिये ज़ंजीर बनाई मैंने

अपनी ग़ज़लों से संवारूँगा ये बज़्म-ए-हस्ती
उम्र सारी इसी चक्कर में गँवाई मैंने

अर्श हिलता है ,ज़मीं काँपने लगती है,यही
आह-ए-मज़लूम की तासीर बताई मैंने

वो भी बैज़ार नज़र आने लगे अब तो "समर"
छोड़ दी जिनके लिये सारी ख़ुदाई मैंने

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on January 15, 2019 at 11:25am

जनाब राज़ नवादवी साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by राज़ नवादवी on January 15, 2019 at 12:42am

आदरणीय समर कबीर साहब, आदाब. बहुत ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने. दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ. सादर. 

Comment by Samar kabeer on January 14, 2019 at 12:01pm

जनाब रवि शुक्ला जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Ravi Shukla on January 14, 2019 at 10:28am

वाह वाह बहुत खूब आदरणीय समर साहब बहुत अच्छी ग़ज़ल आपने कही शेर दर शेर दिली मुबारकबाद कुबूल करें मुझे यह बहर व्यक्तिगत तौर पर बहुत पसंद आती है इसलिए भी यह गजल अच्छी लगी मकता भी कमाल का हुआ है पुनः बधाई पेश करता हूँ 

Comment by Samar kabeer on January 13, 2019 at 5:43pm

जनाब अनीस शैख़ साहिब आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Md. Anis arman on January 13, 2019 at 4:21pm

क्या खूबसूरत ग़ज़ल कही है सर आपने मज़ा आ गया ,पढ़ के ऐसा लग रहा है मानो कोई हसीन लड़की सज के सामने आ गई हो .ग़ज़ल को सजाया है आपने |

Comment by Samar kabeer on May 27, 2015 at 10:40pm
जनाब शिज्जु "शकूर" जी,आदाब,आपकी शिर्कत ग़ज़ल में बहुत देर से हुई ,मैंने आपका बहुत इन्तिज़ार किया,ख़ैर देर आयद दुरुस्त आयद ,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ,मेरी एक ग़ज़ल ओबीओ ने चेक आउट की हुई है,हैरत है आपकी नज़र अभी तक उस पर नहीं पड़ी ।
Comment by Samar kabeer on May 27, 2015 at 10:34pm
जनाब सौरभ पांडे जी,आदाब,एक क़लमकार को दूसरा क़लमकार ही समझ सकता है,आपकी शिर्कत ने ग़ज़ल का मान बढ़ा दिया,सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 27, 2015 at 8:40pm

जनाब समर कबीर साहब आपकी उस्तादाना ग़ज़ल की जितनी तारीफ़ करूँ कम है दिली दादो मुबारकबाद कुबूल फरमायें


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 27, 2015 at 8:00pm

आदरणीय समर साहब,  क़ामयाब ग़ज़ल हुई है.

अर्श हिलता है ,ज़मीं काँपने लगती है,यही
आह-ए-मज़लूम की तासीर बताई मैंने
निश्शब्द  हूँ, साहब !

लेकिन इस खुद्दारी पर क्यों न कोई निसार हो जाए ?

मुझको पाबंदियाँ औरों की ग़वारा ही नहीं
खुद ही अपने लिए ज़ंज़ीर बनाई मैंने..
वाह !


लेकिन मुलामीयत से जो छू गया और अहसास लगातार झूमती लहरें बना झकझोर रहा है, वो ग़ज़ल का मतला है. कितना अपना-अपना सा है ! इसी सोच की बिना पर कभी मैंने भी कहा था --

सोचता हूँ जिसे वही हो क्या ?
डायरी से निकल गयी हो क्या !

ग़ज़ल खूब हुई है..
सादर

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