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वो ज़माना ही कुछ और था
हौसलों और उम्मीदों का दौर था !

आसमां के सितारे भी पास नज़र आते थे!
हर हद से गुज़र जाने का दौर था!!

माना कि मुफलिसी भरी थी वो ज़िन्दगी!
उस ज़िन्दगी में जीने का, मज़ा ही कुछ और था!!

नींद आती नही महलों के नर्म गद्दों पर!
झोपडी के चीथड़ों पर सोने का, मज़ा ही कुछ और था!!

न जाने क्यों हर वो शख़्स ख़फ़ा ख़फ़ा सा नज़र आता है!
मुस्कुराकर कर जिनसे गले लग जाने का,मज़ा ही कुछ और था!!

अब तो दिल की बातें दिल में ही रह जाती हैं!
बड़ी बेबाकी से हर बात कह देने का, ज़ज़्बा ही कुछ और था!!

(मौलिक एवम् अप्रकाशित)

माला झा "खुशबू"

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Comment

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Comment by Mala Jha on May 1, 2015 at 3:07pm
आदरणीय समीर जी साभार धन्यवाद।
Comment by Samar kabeer on May 1, 2015 at 2:35pm
मोहतरमा माला झा जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें |
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 1, 2015 at 1:39pm

न जाने क्यों हर वो शख़्स ख़फ़ा ख़फ़ा सा नज़र आता है!
मुस्कुराकर कर जिनसे गले लग जाने का,मज़ा ही कुछ और था!

इन दो पंक्तियों में लय बाधित सी प्रतीत हो रही है, देख लीजियेगा!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 1, 2015 at 1:38pm

अब तो दिल की बातें दिल में ही रह जाती हैं!
बड़ी बेबाकी से हर बात कह देने का, ज़ज़्बा ही कुछ और था!!

सुन्दर रचना पर बधाई!आ० माला झा जी!

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