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ग़ज़ल -- मेरी बरबाद तमन्ना का जनाज़ा उठ्ठे

अरकान : २१२२-११२२-११२२-२२

मेरी बरबाद तमन्ना का जनाज़ा उठ्ठे
दिल-ए-रेज़ा से शबो रोज़ धुआँ सा उठ्ठे

ये तो मैं हूँ जो ग़मे जाँ से अभी वाबस्ता
मेरे हालात में तो कोई भी घबरा उठ्ठे

झूठ ही झूठ अदालत में दिखाई देता
सच की जानिब से भी तो कोई जियाला उठ्ठे

भूख से मौत के आगोश में जो पहुँचा है
अब न मुफ़लिस का वो सोया हुआ बच्चा उठ्ठे

दुख़्तरे रज़ के तलबगार सभी हैं साक़ी
बस तेरी बज़्म में इक ज़िक्र-ए-पियाला उठ्ठे

लोग दाँतों तले उँगली को दबा लेंगे 'दिनेश'
तेरे किरदार से थोड़ा भी जो पर्दा उठ्ठे

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 14, 2015 at 12:48pm

वाह, क्या खूब कही है.....//.ये तो मैं हूँ जो ग़मे जाँ से अभी वाबस्ता
मेरे हालात में तो कोई भी घबरा उठ्ठे// -----दाद कुबूल करे.  आ0 दिनेश भाईजी.

Comment by Samar kabeer on April 14, 2015 at 11:09am
जनाब दिनेश कुमार जी,आदाब,बहुत ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल हुई है,इस मिसरे में :-

मेरे हालात में तो कोई भी घबरा उठ्ठे

"मेरे" की जगह "ऐसे" लिख देंगे तो बहतर हो जाएगा,ये कोई तनक़ीद नहीं महज़ दोस्ताना मशविरा है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |

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