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ए-हुस्न-जाना...............'जान' गोरखपुरी

ए-हुस्न-जाना..

दिल नही रहा अब तेरा दीवाना...

अब मुझको आया कुछ आराम है।

कि तेरे सिवा जहाँ में और भी बहुत काम है।

ए-हुस्न-जाना..

दिल अब तुझसे बेजार है..

हुस्नो-इश्क जबसे बना व्यापर है।

हूँ जिसका मै सिपहसलार बेकार वो दिल का रोजगार है।

ए-हुस्न-जाना..

दूंढ़ ले अब कोई नया ठिकाना...

मालूम मुझको तेरा मकाम है।

के तेरे सिवा जहाँ में और भी बहुत काम है।

ए-हुस्न-जाना..

छोड़ कफ़स-ए-शम्मा-परवाना...

दुनिया-ए-रू में आ देख क्या आराम है।

मै नहीं! तू नहीं! दर नहीं! हरम नहीं!

कोई है,सब उसी के नाम हैं।

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मौलिक व् अप्रकाशित (c) जान गोरखपुरी

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 22, 2015 at 1:04am
आदरणीय कृष्ण भाई जी हुस्न-ए-जाना सुना था ये ए-हुस्न-जाना क्या है।
दुनिया-ए-रू मतलब
कफ़स-ए-शमा परवाना मतलब
आप की रचना और उसकी विधा से खुद को जोड़ नहीं पा रहा हूँ।
विशेष रूप से आदरणीय गोपाल सर और आदरणीय निर्मल भाई जैसे सुधिजनों की प्रतिक्रिया के परिप्रेक्ष्य में रचना को समझने की भरसक कोशिश की है।निवेदन है कृपया रचना की सार्थकता से अवगत कराने का कष्ट करें।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 21, 2015 at 8:58pm

रचना पर आपकी सार्थक प्रतिकिया पाकर मन हर्षित हुआ!तहेदिल से शुक्रिया आदरणीय! निर्मल नदीम जी!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 21, 2015 at 8:56pm

रचना के अनुमोदन के लिए तहेदिल से शुक्रिया आदरणीय vijai shanker जी!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 21, 2015 at 8:55pm

हौसलाफजाई के लिए बहुत बहुत आभार! आदरणीया प्रतिभा जी!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 21, 2015 at 8:53pm

भाई महर्षि बहुत बहुत शुक्रिया!सस्नेह!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 21, 2015 at 8:52pm

आ० गोपाल नारायण सर!आपकी उपस्थिति पाकर रचनाकर्म सार्थक हो जाता है!बहुत बहुत आभार गुरुवर!

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 21, 2015 at 8:47pm

प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत शुक्रिया आ० shyam mathpal जी.

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 21, 2015 at 8:45pm

सराहना के लिये बहुत बहुत आभार! आदरणीय Shyam Narain Verma जी!

Comment by Nirmal Nadeem on March 21, 2015 at 3:05pm
बहुत खूब
Comment by Dr. Vijai Shanker on March 21, 2015 at 3:58am
आकर्षक , सारगर्भित , बधाई , आदरणीय कृष्ण मिश्रा जी , सादर।

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