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ग़ज़ल - पानी का बना होगा....... (मिथिलेश वामनकर)

1222---1222---1222---1222

 

ग़लतफ़हमी कि पोखर साफ़ पानी का बना होगा

कमल खिलता हुआ होगा तो कीचड़ से सना होगा।

 

सुख़नवर ने सुखन की बाढ़ ला दी क्या कहे साहिब

सुखन में है सुखन कितनी, यही बस सोचना होगा।

 

उजाले कुछ सदाकत के संभालों आखिरी दम को 

न कोई साथ में होगा, अँधेरा भी घना होगा।

 

रवां रफ़्तार में खोया तू अपनी कामयाबी की

न तेरा छूट जाए घर, इसे अब रोकना होगा।

 

दिया है कब निज़ामत ने किसी को मांगने से कुछ

अगर हक़ चाहिए तुमको जबर से छीनना होगा।

 

अमूमन फेसबुक पर मैं बहुत अपडेट रहता हूँ

पड़ोसी कौन है मत पूछ शायद सोचना होगा।

 

हमेशा जी-हुजूरी से यहाँ सब काम होते है

हुनर अब जेब में रख लो कि नाहक ही फ़ना होगा।

 

 

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(मौलिक व अप्रकाशित)  © मिथिलेश वामनकर 
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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 21, 2015 at 7:31pm

आदरणीय निर्मल भाई जी आप ग़ज़ल पर यहीं प्रतिक्रिया दे, मेरे लिए सदैव आपके सुझाव और मार्गदर्शन अमूल्य है. सुधारने का पूरा प्रयास करूँगा. सादर 

Comment by Nirmal Nadeem on March 21, 2015 at 6:54pm
9594525165 मेरा व्हाट्स अप क्रमांक है आप मुझे संदेस भेजने की कृपा करें। कुछ आवश्यक बात करनी है।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 20, 2015 at 9:55pm

आदरणीया प्रतिभा जी ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 20, 2015 at 6:54pm
आदरणीय विजेंदर जी सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार।
Comment by VIRENDER VEER MEHTA on March 20, 2015 at 5:31pm

आज के आधुनिक दौर की सचाई को खूब दर्शाया आदरणीय मितिलेश वामनकर भाई, विशेष कर इन लाइनों में .....

अमूमन फेसबुक पर मैं बहुत अपडेट रहता हूँ

पड़ोसी कौन है मत पूछ शायद सोचना होगा।

 सादर बधाई ....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 20, 2015 at 10:38am
आदरणीय हरिप्रकाश भाई जी ग़ज़ल की सराहना और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार।
Comment by Hari Prakash Dubey on March 19, 2015 at 11:44pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , बहुत ही शानदार रचना है

/दिया है कब निज़ामत ने किसी को मांगने से कुछ
अगर हक़ चाहिए तुमको जबर से छीनना होगा/ बहूत खूब .हार्दिक बधाई ! सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 19, 2015 at 11:29pm

आदरणीय सौरभ सर, ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति से ही मन को संतोष हो जाता है  उस पर सराहना और सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल जाए तो झूम जाता हूँ. आपके मार्गदर्शन अनुसार  कुछ को तो  करता हूँ. अमूल्य सुझाव और सराहना के लिए हृदय से आभारी हूँ. नमन 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 19, 2015 at 11:19pm

दिया है कब निज़ामत ने किसी को मांगने से कुछ
अगर हक़ चाहिए तुमको जबर से छीनना होगा।
ग़ज़ब !
इस शेर की धमक से मन तृप्त हो रहा है ..

उजाले कुछ सदाकत के संभालों आखिरी दम को .. कुछ को तो किया जाये तो व्याकरण सम्मत तो होगा ही अर्थ से भी सँभल जायेगा.
न कोई साथ में होगा, अँधेरा भी घना होगा।

रवां रफ़्तार में खोया तू अपनी कामयाबी की
न तेरा छूट जाए घर, इसे अब रोकना होगा।
अय हय .. बहुत खूब !

ढेर सारी दाद स्वीकार कीजिये आदरणीय.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 19, 2015 at 9:57pm

आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर, स्नेह और सराहना के लिए हार्दिक आभार, नमन 

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