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अचानक घिर आये बादलों को देखकर बल्लू घबरा गया , हवाएँ भी तेज हो गयी थीं | मार्च का महीना , गेहूं की फसल अपनी जवानी पर थी , बालियां निकल आई थीं और कुछ दिनों में इनके पकने की शुरुवात होने वाली थी |
कल खेत से लौटते हुए मन कितना हर्षित था उसका , इस बार तो बैंक का क़र्ज़ चुका ही देगा | पिछले हफ्ते ही नोटिस आया था क़िस्त जमा करने के लिए और उसने उसे बेफिक्री से फेंक दिया था | एक गाय भी लेनी थी उसे इस बार , फिर तो दूध से भी थोड़ी आमदनी बढ़ जाएगी | रात में उसने पत्नी को प्यार से बाँहों में भींच लिया , वो भी मुस्कुरा उठी थी |
देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी , हवाएँ भी रौद्र रूप धारण कर चुकी थीं | बिल्लू गिरते पड़ते खेत की ओर भागा, कल तक दूर से नज़र आने वाली हरियाली आज जमींदोज हो गयी थी | उसको देख मुस्कुराने वाली फसल अब उससे मुंह मोड़ कर ज़मीन से इश्क़ फ़रमा रही थी , उसके सपने तेज हवाओं ने अपने साथ उड़ा दिए थे |
पर इस सबसे दूर शहरों में लोगों को मौसम सुहावना लगने लगा था |

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on March 9, 2015 at 10:20pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय शुभ्रांशु पाण्डेय जी | 

Comment by Shubhranshu Pandey on March 9, 2015 at 10:05pm

आदरणीय विनय जी, 

मौसम के अलग अलग प्रभाव को दिखाते हुये सुन्दर कथा. 

सादर.

Comment by विनय कुमार on March 6, 2015 at 12:41pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय वंदना जी ..

Comment by vandana on March 6, 2015 at 4:37am

बहुत ही बढ़िया लघुकथा विषय और प्रवाह दोनों प्रभावी बहुत २ बधाई आदरणीय 

Comment by विनय कुमार on March 4, 2015 at 4:57pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी..

Comment by विनय कुमार on March 4, 2015 at 4:56pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय परी श्लोक जी..


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 4, 2015 at 3:53pm

आशा और सच्चाई को शाब्दिक करती इस सामयिक लघु कथा केलिए हार्दिक बधाई, आदरणीय विनय भाई ..

Comment by Pari M Shlok on March 4, 2015 at 1:43pm
सामयिक प्रस्तुति ...इस लघुकथा के लिए..बहुत बहुत बधाई
Comment by विनय कुमार on March 4, 2015 at 12:35pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय कृष्ण मिश्रा जी |

Comment by विनय कुमार on March 4, 2015 at 12:34pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय जीतेन्द्र पस्टारिया जी | बहुत विस्तृत और सटीक वर्णन किया है आपने किसान के उम्मीदों का | इतना विकास होने के बाद भी आज भी किसान न केवल प्रकृति पर निर्भर है बल्कि ऐसी विपदाओं से पार पाना उसके बस में नहीं है | और ये भी सच है की जब तक फसल कट कर घर में न पहुँच जाये , वो अनिश्चितता के बीच झूलता रहता है | 

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