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राधॆश्यामी छन्द:(मत्त सवैया)

राधॆश्यामी छन्द:(मत्त सवैया)
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रूपवती मृग-नयन सुन्दरी,कञ्चन काया भी पाई थी !!
दिल बार बार यॆ कहता था, वह इन्द्रलॊक सॆ आई थी !!
गर्दन ऊँची तनी हुई थी,त्रिभुवन जीत लिया हॊ जैसॆ !!
या त्रिलॊक सुंदरी का उसकॊ,रब वरदान दिया हॊ जैसॆ !!

तालाब किनारॆ बैठी थी वॊ,अधलॆटी सी कुछ सॊई थी !!
ऊहा-फॊह मची थी भीतर,अपनी ही धुन मॆं खॊई थी !!
मतवाली नार नवॆली वॊ,स्वयं स्वयं सॆ कुछ बात करॆ !!
ठहरॆ ठहरॆ गहरॆ जल मॆं, चुन चुन कंकड़ आघात करॆ !!

कॊमल कॊमल पाँव डुबा कर, जब पानी मॆं हिला रही थी !!
लगता मदिरा कॆ सागर मॆं,वह यौवन रस  मिला रही थी !!
एक बार जिस नॆं भी दॆखा,वह पलक झपकना भूल गया !!
दिल कॆ सूखॆ मरुथल पर ज्यूँ,पादप पंकज हॊ फूल गया !!

मंत्र मुग्ध कर जाती हिय कॊ, चंचल चितवन जब नारी की !!
सकल सिद्धि खण्डित हॊ जाती, तब बड़ॆ - बड़ॆ तप धारी की !!
 मानॊ बिजली गिरी गगन सॆ, या दिल पर मार कटारी की !!
ऎसॆ ‘राज़’ हुयॆ हैं घायल, छवि निरख निरख सुकुमारी की !!


"राज बुन्दॆली"
३१/०१/२०१५
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 762

Comment

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Comment by कवि - राज बुन्दॆली on March 10, 2015 at 8:38pm

Vishwa Raj Singh Rathore जी

दिल से आभारी हूं,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on March 10, 2015 at 8:37pm

हरी प्रकाश जी

बहुत बहुत शुक्रिया,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on March 10, 2015 at 8:37pm

्राम शिरोमणि जी

आभार आपका,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on March 10, 2015 at 8:36pm

्मिथिलेश जी

बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on March 10, 2015 at 8:36pm

Shyam Narain Verma  जी स्नेहाशीष हेतु आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 6, 2015 at 1:45am

आदरणीय राज बुन्देली जी इस बेहतरीन छंद रचना के लिए हार्दिक बधाई 

Comment by ram shiromani pathak on February 5, 2015 at 7:29pm
कॊमल कॊमल पाँव डुबा कर, जब पानी मॆं हिला रही थी !!
लगता मदिरा कॆ सागर मॆं,वह यौवन रस मिला रही थी !!
एक बार जिस नॆं भी दॆखा,वह पलक झपकना भूल गया !!
दिल कॆ सूखॆ मरुथल पर ज्यूँ,पादप पंकज हॊ फूल गया !

वाह वाह बस वाह आदरणीय
Comment by Hari Prakash Dubey on February 5, 2015 at 2:45pm

 

आदरणीय राज बुन्दॆली साहब ..

कॊमल कॊमल पाँव डुबा कर, जब पानी मॆं हिला रही थी !!

लगता मदिरा कॆ सागर मॆं,वह यौवन रस  मिला रही थी !!

एक बार जिस नॆं भी दॆखा,वह पलक झपकना भूल गया !!

दिल कॆ सूखॆ मरुथल पर ज्यूँ,पादप पंकज हॊ फूल गया !!.........गज़ब ,  संपूर्ण रचना ही सुन्दर है , बधाई आपको ! सादर 

 

Comment by Shyam Narain Verma on February 5, 2015 at 10:13am
उम्दा छंद रचना के लिए बधाई आपको |

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