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"आत्मायें बिक चुकीं हैं"

आत्मायें,

बिक चुकीं हैं,

बेचीं जा रहीं हैं,

कुछ असहाय,बिचारीं हैं,

कुछ म्रत्प्रायः,

कुछ मर चुकी हैं !

शरीर,

उन मृत आत्माओं का,

बोझ ढोए जा रहें हैं !

शब्द,

खो चुके अपना अर्थ,

उन अर्थहीन शब्दों से,

अच्छे दिनों के नारे लगा रहें हैं !

पैर,

चलना नहीं चाहते,

उन अनिच्छुक पैरों को ,

अच्छे दिनों की आस में,

कंटक पथों पर जबरन चला रहें हैं !

ईश्वर,

रंगमंच पर विद्यमान है,

नाटक वही है,

दृश्य पर दृश्य,

बदलते जा रहें हैं !

लोग,

घायल दिलों से,

सवाल कर रहें हैं,

अच्छे दिन कब आ रहें हैं ?

 

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

 

Views: 903

Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on January 16, 2015 at 10:55am

शिशिर जी आपका बहुत बहुत  धन्यवाद !

Comment by Hari Prakash Dubey on January 16, 2015 at 10:52am

आपका बहुत - बहुत धन्यवाद ,आदरणीया सीमा तिवारी  जी ! सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on January 16, 2015 at 10:50am

आदरणीय गिरिराज सर  ,उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार ! सादर

Comment by Hari Prakash Dubey on January 16, 2015 at 10:47am

आपका हार्दिक आभार आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर, सादर !

Comment by Hari Prakash Dubey on January 16, 2015 at 10:45am

आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय  लक्ष्मण धामी जी !

Comment by Hari Prakash Dubey on January 16, 2015 at 10:43am

रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आदरणीय  श्याम नारायण वर्मा  जी !.

Comment by Hari Prakash Dubey on January 15, 2015 at 8:21pm

आपकी प्रतिक्रिया से उत्साह मिला  आपका बहुत - बहुत धन्यवाद ,आदरणीया प्रतिभा त्रिपाठी जी ! सादर

Comment by seematiwari on January 15, 2015 at 12:20pm

ईश्वर,

रंगमंच पर विद्यमान है,

नाटक वही है,

दृश्य पर दृश्य,

बदलते जा रहें हैं !

लोग,

घायल दिलों से,

सवाल कर रहें हैं,

अच्छे दिन कब आ रहें हैं ?........क्या बात है !!!! बहुत सुंदर.....

Comment by Shishir Dwivedi on January 14, 2015 at 11:32pm
बहुत सुन्दर रचना है। बहुत बधाई आप को
Comment by Hari Prakash Dubey on January 14, 2015 at 8:54pm

आदरणीय जवाहर जी ,हार्दिक आभार आपका , रचना अपने मर्म को समझाने में कामयाब रही शायद ! सादर !

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