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ग़ज़ल :- खार में भी कली खिला देगा

ग़ज़ल :- खार में भी कली खिला देगा

खार में भी कली खिला देगा ,

आदमी जब भी मुस्कुरा देगा |

 

यह तो दस्तूर है ज़माने का ,

नाम लिख कर कोई मिटा देगा |

 

खत को उठेंगे जब भी हाथ मेरे ,

मन मेरा आपका पता देगा |

 

जल रही हैं जड़ें बगावत में ,

पेड़ को अब पवन गिरा देगा |

 

इन पहाड़ों पर रोशनी न करो ,

आदमी घर यहाँ बना लेगा |

 

ये लगन मुझमे किस वजह से है ,

काम मेरा तुम्हे बता देगा |

 

खुद घिरा है वो बद्दुआओं में ,

वो यकीनन तुम्हे दुआ देगा |

 

आदमी सिर्फ एक बहाना है ,

जब भी देगा हमें खुदा देगा |

 

एक अभिनव फकीर आया है ,

बस्तियों में अलख जगा देगा |

 

(@अभिनव अरुण # १३-०२-२००४)

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on March 14, 2011 at 8:29am
धन्यवाद विवेक जी , आभार अश्वनी जी | आपने गज़ल पसंद की मेरा हौसला बढ़ा |
Comment by विवेक मिश्र on March 13, 2011 at 10:18pm
वाह अरुण जी... क्या बात है.. बहुत खूब.. सारे अश'आर बेहतरीन हैं. दाद कबूल करें.
Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on March 13, 2011 at 5:22pm
kya baat hai arun ji
Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on March 13, 2011 at 5:22pm
bastiyon mein alakh jaga dega
Comment by Abhinav Arun on March 13, 2011 at 3:59pm
शुक्रिया एडमिन जी इतनी तेज़ सुनवाई के लिये ....
Comment by Admin on March 13, 2011 at 3:58pm
आदरणीय अरुण जी, "जागा देगा "को  'जगा देगा ' कर दिया गया है |
Comment by Abhinav Arun on March 13, 2011 at 3:25pm
एडमिन जी "जागा देगा "को कृपया 'जगा देगा ' कर दे, आभारी रहूँगा |

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