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कितना तामझाम...(नवगीत ) सीमा हरि शर्मा

कितना तामझाम....(नवगीत)

कितना तामझाम पसराया
जीवन आँगन में।

स्वर्णिम किरणें सुबह जगाती
दिन भर आपाधापी है।
साँझ धुँधलके से घिर जाती
रात तमस ले आती है।
तम को रोज झाड़ बुहरया
जीवन आँगन में।....कितना तामझाम पसराया

गजब मुखोटे मुख पर सजते
तन मशीन के कलपुर्जे।
जीने का दम भरने वाले
मानव ने ये खुद सरजे।
दूर खड़ा मन है खिसियाया
जीवन आँगन में।.....कितना तामझाम पसराया

रेलम पेला धक्का मुक्की
चलती आवाजाही है।
जीवन सरकस जैसा चलता
जोकर की वावाही है।
एक गिरा दूजा धकियाया
जीवन आँगन में।

कितना तामझाम पसराया
जीवन आँगन में।

.
सीमा हरि शर्मा 26.12.2014
(मेरा यह नवगीत मौलिक एवं अप्रकाशित है)

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Comment by seemahari sharma on December 27, 2014 at 10:29pm
आदरणीय Shyam Narain Verma जी आभार
Comment by seemahari sharma on December 27, 2014 at 10:27pm
आदरणीय शिज्जु "शकूर"जी बहुत बहुत आभार आपकी प्रतिक्रिया से रचनाधर्मिता को प्रोत्साहन मिला है।
Comment by seemahari sharma on December 27, 2014 at 10:22pm
आदरणीय गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी आभार रचना को आपका आशीर्वाद मिला
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 27, 2014 at 8:08pm

आ० सीमा हरि जी

बेहतरीन i


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 27, 2014 at 7:02pm

आदरणीया सीमा हरि जी बहुत सुंदर नवगीत का सृजन हुआ है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Shyam Narain Verma on December 27, 2014 at 2:16pm

 सुन्दर अभिव्यक्ति पर हार्दिक बधाई।

Comment by seemahari sharma on December 26, 2014 at 11:23pm
ajay sharma जी बहुत बहुत आभार आपकी प्रतिक्रिया अत्यंत उत्साहवर्धक है बहुत शुक्रिया
Comment by seemahari sharma on December 26, 2014 at 11:18pm
Somesh kumar जी आभार
Comment by seemahari sharma on December 26, 2014 at 11:17pm
आ.Hari Prakash Dubey जी बहुत आभार रचना पसंद करने के लिए
Comment by seemahari sharma on December 26, 2014 at 11:13pm
आभार मिथिलेश वामनकर जी आपने नवगीत को सराहा। आप सही कह रहें हैं यह टंकन त्रुटी ही है असली शब्द (बुहराया) है। धन्यवाद गलती बताने के लिए

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