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अब जाना जफा ज़माने की......................

सजा मिली है मुहब्बत में वफ़ा  निभाने की|
अब जाना जफा ज़माने की.......................
उसने पल भर में उम्मीदों का गला घोंट दिया|
जिंदगी भर न भूलू उसने ऐसी चोट दिया|-२
हसरतें रह गयी पलकों पे उसे सजाने की|
अब जाना जफा ज़माने की......................
उसने इकरार मुहब्बत का बार -बार किया|
मैंने भी बेसुध बेख़ौफ़ उसे प्यार दिया|
यही तमन्ना अब उसको भूल जाने की,
करूँ तमन्ना अब उसको भूल जाने की|
अब जाना जफा ज़माने की......................
अपनी झूठी मुहब्बत में मुझे बांधे रखा|
एक ही तीर से निशाने कई साधे रखा|
ऐसी कोशिश की वो खुद को बहलाने की|
अब जाना जफा ज़माने की......................
सजा मिली है मुहब्बत में वफ़ा  निभाने की|

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Comment

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Comment by Narendra Vyas on March 13, 2011 at 12:15pm
बेहद ही ख़ूबसूरत भावों की अभिव्यंजना  ! पर आपको दिल से बधाई आशीष जी ! एक सकारात्मक प्रयास ! आपने बेहतर रचना दी है हाँ, कहीं-कहीं अगर थोड़ा सा वर्तनी और ग्रामर और मज़बूत हो जाए तो क्या कहने.. !  कृपया अन्यथा न लीजियेगा..! मेरी ढेरों शुभकामनाएँ स्वीकार कीजियेगा. आभार !
Comment by Rector Kathuria on March 13, 2011 at 10:42am

बहुत बढ़िया--

सजा मिली है मुहब्बत में वफ़ा  निभाने की|

अब जाना जफा ज़माने की.....

यही होता है....

अपनी झूठी मुहब्बत में मुझे बांधे रखा|
एक ही तीर से निशाने कई साधे रखा|

 

Comment by आशीष यादव on March 13, 2011 at 9:11am
रत्नेश जी, बागी जी और वंदना जी हौसला आफजाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद| आप लोगो के दम से ही तो हमारा दम है|

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 12, 2011 at 9:25am
वाह वाह आशीष भाई , बहुत बढ़िया रचना , शानदार अभिव्यक्ति हेतु बधाई आपको |
Comment by Ratnesh Raman Pathak on March 10, 2011 at 3:34pm
अपनी झूठी मुहब्बत में मुझे बांधे रखा|
एक ही तीर से निशाने कई साधे रखा|
ऐसी कोशिश की वो खुद को बहलाने की|
अब जाना जफा ज़माने की......................
सजा मिली है मुहब्बत में वफ़ा  निभाने की|
आशीष भाई आप के किसी भी रचना से  ऐसी सुगंध आती है की उसे पढ़ कर उसके भाव को जानने को मनन बेचैन हो जाता है

कृपया ध्यान दे...

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