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हूँ महफ़िलों में तन्हा, खुद की नज़र में रुस्वा

हर एक रंग फीका , हर एक शै फसुर्दा

आवाज़ें दोस्तों की ,मुझ से नहीं हैं गोया
ज़िंदा दिली भी जैसे , करती है मुझ से पर्दा

क्या ग़म है ज़िन्दगी में , तुमको बताऊँ कैसे
अब तक हुआ नहीं है , ये राज़ मुझे पे अफ़्शाँ

उलझन है कैसी दिल की ? उलझन यही है मुझको
रंग ज़िन्दगी से रूठे , दिल भी रंगों से रूठा

अपने ग़मों के बाइस , खुश देखता हूँ तुमको
शायद उसी ख़ुशी से , रखता हूँ खुद को ज़िंदा

.

-सालिम शेख 

"मौलिक व अप्रकाशित"

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 13, 2014 at 7:40pm

आदरणीय सालिम  जी एक अच्छी रचना के लिए हार्दिक बधाई ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2014 at 12:12pm

आदरणीय भाई सालिम शेख जी एक अच्छी गजल के लिए हार्दिक बधाई ।

Comment by saalim sheikh on December 12, 2014 at 10:55am

धन्यवाद आदरणीय शिज्जु जी और राजेश कुमारी जी
मेरे ख्याल से रदीफ़ की कमी रह गयी है शायद ,मैं अगली बार ख्याल रखूँगा
मार्गदर्शन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by saalim sheikh on December 12, 2014 at 10:53am

शुक्रिया umesh katara  साहब 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 11, 2014 at 9:39pm

शिज्जू जी की बात से सहमत हूँ इस को ग़ज़ल के पैमाने पर कसिये बेहद शानदार अशआर हैं उम्दा ग़ज़ल में निखर कर आएगी |

बहरहाल बहुत बहुत बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 11, 2014 at 8:55pm

जनाब सालिम शेख साहब ये रचना उम्दा ग़ज़ल बन सकती है अभी इस रचना को ग़ज़ल नहीं कहा जा सकता इस मंच पर जानकारियाँ मौजूद आपके बहुत काम आयेगी शुभकामनायें

Comment by umesh katara on December 11, 2014 at 8:02pm

वाहहह वाहहहहहहहहह

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