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मुझे तो जीतना ही था (नज़्म, बह्र-ए-हजज़)

1 2 2 2

 

हुआ पैदा कि धोके से, किसी का पाप मैं बन के

मुझे फेंका गया गन्दी कटीली झाड़ियों में फिर

कि चुभती झाड़ियाँ फिर फिर, कि होता दर्द भी फिर फिर

यहाँ काटे कभी कीड़े, वहां फिर चीटियाँ काटे

 

पड़ा देखा, उठा लाई, मुझे इक चर्च की दीदी.

 

हटा के चीटियाँ कीड़े, धुलाए घाव भी मेरे

बदन छालों भरा मेरा, परेशां मैं अज़ीयत से

खुदा से मांगता हूँ मौत अपनी सिर्फ जल्दी से

 

बड़ी नादान दीदी वो, लगाती जा रही मरहम

दुआ करती हुई वो मांगती बस जिंदगी मेरी

कि जैसे शर्त दीदी और मेरे बीच चलती सी

 

कज़ा-ओ-ज़ीस्त का जैसे कि कोई सामना ही था

कि दीदी हार बैठी फिर, मुझे तो जीतना ही था

 

 

-------------------------------------------------------
(मौलिक व अप्रकाशित) - मिथिलेश वामनकर 
-------------------------------------------------------

 

 (नज़्म, बह्र-ए-हजज़)  [ 1 2 2 2 ]

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 12, 2014 at 9:49pm
आदरणीय लक्ष्मन धामी जी आभार, बहुत बहुत धन्यवाद
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 12, 2014 at 12:08pm

आदरणीय भाई मिथिलेश जी,इस भावुक रचना के लिए हार्दिक बधाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 11, 2014 at 10:20pm
आदरणीय शिज्जु जी आपने नज़्म पसंद की यही बड़ी बात है। बहुत बहुत आभार। धन्यवाद।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 11, 2014 at 9:33pm

बहुत खूब आदरणीय मिथिलेश जी बहुत बहुत बधाई आपको


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 11, 2014 at 8:19pm

ये दो बदलाव किये है सादर 

"गन्दी कटीली झाड़ियों"

"कज़ा-ओ-ज़ीस्त का जैसे"


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 10, 2014 at 11:39pm

आदरणीय योगराज प्रभाकर सर, आपने जो दो बड़ी त्रुटियाँ चिन्हित की थी उनमें सुधारने का प्रयास किया है ..... सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 10, 2014 at 10:58pm
आदरणीय सलीम भाई बहुत बहुत आभार धन्यवाद
Comment by saalim sheikh on December 10, 2014 at 10:13pm

बहुत खूबसूरत और दिल को चुने वाली नज़्म के लिए बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 10, 2014 at 9:02pm
आदरणीय गिरिराज भंडारी सर आपको प्रयास पंसद आया यही मेरा प्रोत्साहन है। आभार धन्यवाद।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 10, 2014 at 9:00pm
बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय राहुल दांगी जी । मैं तो सिर्फ एक बह्र में लिख कर नज़्म कहता हूँ बाकि नज़्म की बारीकियां गुणीजन ही बता सकते है।

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