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वो मेरा साथी मेरा सहारा मेरा दोस्त

मेरी खिड़की से दीखता है एक पेड़

उसका हाल भी मेरे जैसा ही है

ना जाने कब प्यार कर बैठे हम

जब भी खिड़की खोलती हूँ

उसे अपने इन्तजार में ही पाती हूँ

 

कोई तो है जिसे हर पल मेरा इन्तजार है

मेरा साथी मेरा सहारा मेरा दोस्त

एक अनजाना सा बंधन बंध गया है

हम दोनों के बीच में

हर पल मुझे ही निहारा करता है

 

जब भी उसके सामने से गुजरती हूँ

कहता है जल्दी आना

में तुम्हारा यही इन्तजार कर रहा हूँ

दिल खुश हो जाता है कोई तो है

जिसे मेरा इन्तजार रहता है

 

बहुत सुन्दर नही है धूल मिट्टी से सना है

मेरे दिल में उसने भावनाओं को बुना है

मुझे उससे बातें करना अच्छा लगता है

क्यूंकि मेरी हर बात में वो मेरे साथ है

वो मेरा साथी मेरा सहारा मेरा दोस्त

 

सरिता पन्थी  "मौलिक व अप्रकाशित "

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Comment

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Comment by somesh kumar on December 2, 2014 at 11:24am

सुंदर !

कभी रुमाल कभी कागज बन के उसके पत्ते आए 

मैं जली दुखों में छन के दामन से ठंडे झोके आए 

दर्द में साथ देने को लुटा दिए उसने पत्ते पीले

जब बसंत आया जीवन का तो फूल उसपे सुनहरे आए |

पेड के साथ जुड़ी भावना |सुंदर !

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 2, 2014 at 11:10am
एक सुन्दर प्रस्तुति।
जब कोई ठहरता नहीं देर तक तो
जो ठहरा है उसी से दोस्ती कर लें ॥
बधाई इस अर्थपूर्ण रचना के लिए आदरणीय सरिता पंथी जी।
Comment by Shyam Narain Verma on December 2, 2014 at 11:06am

बहुत  ही सुन्दर प्रस्तुति  //हार्दिक बधाई आपको 

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