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बताओ जरा क्या तुम इतने बड़े हो?(ग़ज़ल 'राज' )

१२२ १२२ १२२ १२२

नहीं पाँव दिखते जहाँ पर  खड़े हो

बताओ जरा क्या तुम इतने बड़े हो?

 

उड़ाया जिसे ठोकरों से हटाया

उसी ख़ाक के तुम छलकते घड़े हो

 

जमाना नया है नयी नस्ल आई

पुराने चलन पर अभी तक अड़े हो

 

झुकी कायनातें झुका आसमां तक

न सोचो खुदी को फ़लक पे जड़े हो

 

वही रास्ते हैं वही मंजिलें हैं

वही कारवाँ है मगर तुम छड़े हो 

 

जहाँ है मुहब्बत वहीँ हैं उजाले

निहाँ तीरगी है जहाँ गिर पड़े हो  

 

कभी आके लेलो जरा साँस बाहर

कहीं घुट न जाए गुमाँ में गड़े हो 

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by Dr. Vijai Shanker on November 1, 2014 at 4:16pm

कभी आके लेलो जरा साँस बाहर
कहीं घुट न जाए गुमाँ में गड़े हो
बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही आपने आदरणीय राजेश कुमारी जी। बधाई।

Comment by Sushil Sarna on November 1, 2014 at 1:24pm

जहाँ है मुहब्बत वहीँ हैं उजाले
निहाँ तीरगी है जहाँ गिर पड़े हो … वाह क्या कहने .... खूबसूरत अंदाज़ की खूबसूरत ग़ज़ल ,,, हार्दिक बधाई आदरणीया

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