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बहू के बदन पर देख,

'गहनों का भार'... 
छलक उठा ससुराल वालों की आँखों में, सोया हुआ प्यार । 
सास! बलाएँ लेकर, बहू को गले से लगाएँ,
ससुर! मूंछों पर ताव देते, ख़ुशी से फूले न समाएँ,
ननद! भाभी की सुहाग-सेज, फूलों से सजाएँ,
पति! गुलाब-जल छिड़क, पत्नी का घूंघट उठाएँ ॥ 
बहू के बदन पर देख,
'गायब गहनों का भार'... 
छलक उठा ससुराल वालों की आँखों में, हिंसक व्यवहार । 
सास! बद्दुआएँ देकर, बहू को जली-कटी सुनाएँ,
ससुर! इधर-उधर मँडराते, गुस्से से मुँह फुलाएँ,
ननद! भाभी की सुहाग-सेज, रसोई में सजाएँ,
पति! मिट्टी का तेल छिड़क, साड़ी के छोर में आग लगाएँ ॥ 
मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 16, 2014 at 8:49am

माननीय गीत जी,
रचना पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।

Comment by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 16, 2014 at 8:48am

माननीय सोमेश जी,
रचना की गहराई परखने के लिए ह्रदय से आभार ।

Comment by संदेश नायक 'स्वर्ण' on October 16, 2014 at 8:46am

माननीया संध्या जी,
रचना पर आपकी अभिव्यक्ति के लिए सादर आभार ।

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 16, 2014 at 8:02am

बहुत सुंदर . बधाई आदरणीय सन्देश जी

Comment by somesh kumar on October 15, 2014 at 11:01pm

एक सत्य है एस कविता में 

Comment by Dr.sandhya tiwari on October 15, 2014 at 3:01pm
बहुत सुन्दर भाव

कृपया ध्यान दे...

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