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राम के वंशज कहाँ खो गये --डा० विजय शंकर

राम के वंशज कहाँ खो गये ,
उत्तराधिकारी रावण के
क्यों प्रबल हो गये ॥

कितना कठिन है राम के
रूप को लोगों में ज़िंदा रखना ,
राम की मर्यादा बनाये रखना ,
रावण तो है , स्वतः है ,
अपने आप ज़िंदा रहता है |

कैसे कुछ लोग राम राम जपते हैं ,
रावण जैसा बनने को तरसते हैं ।
मौक़ा मिलते ही रावण बनने के
हर एक जतन करते हैं |

उन्हें भी सोने की लंका चाहिए ,
सोने का हिरन चाहिए ,
सुंदरी हरण का मौक़ा चाहिए |

राम का त्याग , राम का तप
राम का वनवास किसे चाहिए ,
राम का प्रायश्चित किसे चाहिए |

राम के वंशज कहाँ खो गये ,
उत्तराधिकारी रावण के
क्यों प्रबल हो गये ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Dr. Vijai Shanker on October 4, 2014 at 9:36pm

आपकी स्वीकृति से कविता का मान बढ़ा है , आभार. धन्यवाद आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान जी ,  

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 4, 2014 at 3:32pm

आदरणीय राजेश कुमारी जी रचना को प्रशस्ति प्रदान करने के लिए आभार एवं बधाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 4, 2014 at 11:23am

बहुत सुन्दर विचारणीय भाव प्रधान प्रस्तुति हार्दिक बधाई आपको डॉ. विजय शंकर जी | 

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 3, 2014 at 6:18pm
आदरणीय अखिलेश कृष्ण जी , आपके द्वारा जोड़ी गयी पंक्तियों के लिए आभार . रचना को स्वीकार कर मान देने के लिए ह्रदय से धन्यवाद , सादर . विजयदशमी की शुभकामनायें .
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 3, 2014 at 6:14pm
प्रिय जीतेन्द्र जी , विजयदशमी की शुभकामनायें . रचना को मान देने के लिए ह्रदय से धन्यवाद ल सद्भावनाओं सहित .
Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 3, 2014 at 1:25pm

आदरणीय .विजय शंकर भाई 

सबके हृदय में राम हैं, पर सब की सोच में रावण।

इसीलिए मौका मिलते ही, बन जाते हैं रावण ॥

अति सुंदर , हार्दिक बधाई स्वीकार करें । 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 3, 2014 at 12:47pm

सदा की तरह आपने एक और गहन रचना रची, आदरणीय डा.विजय जी. एक सार्थक प्रश्न खड़ा किया है. बहुत बहुत बधाई आपको व् विजयादशमी की शुभकामनाएं

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 3, 2014 at 10:21am
आदरणीय इंजीo गणेश जी बागी जी आपको रचना पसंद आई, रचना सार्थक हुई, धन्यवाद।
Comment by Dr. Vijai Shanker on October 3, 2014 at 10:18am
धन्यवाद आदरणीय सविता मिश्रा जी .

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 3, 2014 at 8:22am

भाव प्रधान इस रचना पर बधाई प्रेषित है आदरणीय।

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