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चारसू आइने लगाना भी

चारसू आइने लगाना भी

और ख़ुद से नज़र चुराना भी

बैठकर साये में मेरे रहरौ

चाहता है मुझे गिराना भी

मेरी मौजूदगी भी नादीदा

सुर्ख़ियों में तेरा न आना भी

शौक आवारगी का किसको है

हो कहीं अपना आशियाना भी

बस्तियों को उजाड़ने वालों

सीख लो बस्तियाँ बसाना भी

हो गया एक जंग के जैसा

आजकल रोटियाँ जुटाना भी

आज ‘खुरशीद’ बालता है दिल

साथ देगा कभी ज़माना भी 

मौलिक व अप्रकाशित 

 

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Comment

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Comment by Ram Awadh VIshwakarma on September 18, 2014 at 11:57am

आप तो उस्तादों के भी उस्ताद हैं ढेरों बधाइयाँ
सभी शेर सलीके से कहे गये एवंप्रभावशाली हैं।

Comment by khursheed khairadi on September 18, 2014 at 9:56am

आदरणीय गोपाल नारायण सा. ,जितेंदर जी ,हरिवल्लभ शरमा जी आप सभी कई ह्रदय की गहराइयों से आभार 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 17, 2014 at 12:16pm

हो गया एक जंग के जैसा

आजकल रोटियाँ जुटाना भी.......बहुत हद तक सही कहा, हार्दिक बधाई आपको आदरणीय खुर्शीद साहब

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 17, 2014 at 11:34am

बेहतरीन

खुर्शीद  भाई आप तो उस्ताद हैं .

Comment by harivallabh sharma on September 17, 2014 at 11:14am

जनाब Khusheed khairadi साहब सुन्दर ग़ज़ल आपकी...बधाई..

कृपया ध्यान दे...

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