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" कितने गंदे लोग हैं , छी , सब तरफ गन्दगी ही गन्दगी , उधर किनारे चलते हैं " कहते हुए लड़का बड़े प्यार से हाथ पकड़ कर उसे किनारे ले गया और आँखों में आँखें डाल कर खो गए दोनों |

" साहब मूंगफली ले लो , टाइम पास " |

" ठीक है , दे दो " , और फटाफट पैसे देकर रुखसत किया उसको |

पता ही नहीं चला , कब मूंगफली ख़त्म हो गयी और अँधेरा हो गया | दोनों उठ कर चलने लगे |

लेकिन जैसे ही लड़की ने झुक कर छिलके उठाये , लड़के का हाथ अपने गाल पर चला गया |  

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on August 25, 2014 at 5:34pm

आभार मीना पाठकजी..

Comment by Meena Pathak on August 25, 2014 at 5:53am

सुन्दर , संदेशप्रद लघुकथा ..सादर बधाई स्वीकारें 

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 24, 2014 at 8:17pm

आदरणीय श्री विजय कुमार सिंह जी, मतलब समझाने के लिए ह्रदय से आभार! दरअसल इतनी महीन बात मुझे समझ में नहीं आई. क्या करें अक्सर हम लोग ऐसा ही करते हैं एक बार गीतांजलि एक्सप्रेस के टू टायर ए सी के डिब्बे में सीट के नीचे केले के छिलके मैंने भी देखे थे जबकि वहां 'डस्ट बिन' पास ही था.

Comment by विनय कुमार on August 24, 2014 at 1:53am

आभार सुभ्रांशुजी..

Comment by विनय कुमार on August 24, 2014 at 1:52am

आभार जितेंद्रजी..

Comment by Shubhranshu Pandey on August 24, 2014 at 12:53am

आदरणीय विनय जी,

जिस जगह को साफ़ करने में काफ़ी वक्त लग जाता है गंदा होने में  उसे कुछ समय लगता है. सुन्दर कथा. बधाई.

सादर.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 23, 2014 at 12:10am

बहुत सही बिंदु को आपने लघुकथा का केंद्र बनाया है आदरणीय विनय जी. कभी कभी बिना आवाज के भी तमाचे पढ़ जाया करते है. बधाई स्वीकारें

Comment by विनय कुमार on August 22, 2014 at 9:42pm

आभार राजेश कुमारी जी..

Comment by विनय कुमार on August 22, 2014 at 9:41pm

आभार लक्ष्मण प्रसादजी..

Comment by विनय कुमार on August 22, 2014 at 9:41pm

आभार सौरभ पाण्डेयजी , स्नेह बना रहे ..

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