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अपना फ़र्ज़ निभाने दे!

अपना फ़र्ज़ निभाने दे!
फिर से वही बहाने दे !!

तेरा भी हो जाऊँगा !
खुद का तो हो जाने दे !!

गैरों के घर खूब रहा!
अपने घर भी आनें दे !!

मूर्ख दोस्त से अच्छा है !
दुश्मन मगर सयाने दे!!

कागज़ की फिर नाव बनें !
बचपन वही पुराने दे !!
*****************************

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

मौलिक/अप्रकाशित

Views: 723

Comment

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Comment by ram shiromani pathak on August 18, 2014 at 6:23pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी...........सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 18, 2014 at 1:54pm

सुंदर और सहज रचना के लिए बधाई श्री राम भाई -

मूर्ख दोस्त से अच्छा है !
दुश्मन मगर सयाने दे!!---तभी तो जीवन में संघर्ष रत रहेंगे |

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 18, 2014 at 11:30am

आ० भाई राम सिरोमनि जी , बेहतरीन ग़ज़ल हुई है . हार्दिक बधाई .

कागज़ की फिर नाव बनें !
बचपन वही पुराने दे !!

बहुत खूब कहा .

Comment by ram shiromani pathak on August 18, 2014 at 12:51am

हार्दिक आभर आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव  जी .........   सादर

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 17, 2014 at 9:23pm

सुन्दर !

तेरा भी हो जाऊँगा !
खुद का तो हो जाने दे !!

कृपया ध्यान दे...

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