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डरी, सहमी सी लगती है

अंदर जो आवाज है

जिसे अन्तरात्मा कहते हैं

वो चुप है

इस निःशब्द वातावरण मे

वह चीख बनके

निकलेंगे कब ?

जिंदगी, आखिर ....

शुरू होगी कब ?

खुले मन से हँसी

आएगी कब ?

कब खिलखिलाकर

सच सच कहूँ तो

दाँत निपोर कर

आखिर हँसेंगे कब ?

बरसों से इस जाल मे बंधी

उसी राह पर चलते – चलते

आखिर हम बदलेंगे कब ?

थोड़ी आस,

थोड़ा विश्वास

धीरे धीरे पिघलता मन

आखिर कितना बचेगा ?

डर है मुझे ...

इस मुखौटे को पहनकर

दिखावा कर के

मेरा धीरज न टूट जाए

स्वयं ही स्वयं के

सृजन को आखिर

बचाऊँ मे क्यूँ ?

कल आखिर बस

इस जहां में एक

किस्सा रह जाऊंगा ...

इतिहास बन जाऊंगा ...

अपने ही अक्स में

अपनी को ही मार डालूँगा

आखिर क्यूँ ?....

 

 

(मौलिक व अप्रकाशित )

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 6, 2014 at 8:09pm

सुन्दर अभिव्यक्ति ...हार्दिक बधाई आपको आमोद कुमार जी 

Comment by Amod Kumar Srivastava on August 5, 2014 at 10:01pm

आपका आशीर्वाद प्राप्त हुआ आ0 सौरभ सर ... सादर प्रणाम ... 

Comment by Amod Kumar Srivastava on August 5, 2014 at 10:00pm

बहुत बहुत आभार आ0 मीना पाठक दी ... सादर 

Comment by Amod Kumar Srivastava on August 5, 2014 at 10:00pm

धन्यवाद भाई शिरोमणि पाठक जी ... आभार ... 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 5, 2014 at 4:39pm

अपने परिचय के प्रति संशय की समुचित अभिव्यक्ति हुई है, भाई आमोद जी.

बधाई स्वीकार करें.

Comment by Meena Pathak on August 4, 2014 at 11:35am

बहुत सुन्दर ...बधाई 

Comment by ram shiromani pathak on August 3, 2014 at 8:04pm

सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय। ।   हार्दिक बधाई आपको 

कृपया ध्यान दे...

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