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घोड़े नहीं रहे --डा० विजय शंकर

घोड़े नहीं रहे , घोड़ों का युग नहीं रहा
मेंढ़क हैं , तरह तरह के मेंढ़क,
हरियाली है उनकीं , हरे हरे से मेंढ़क,
उछलते , कूदते , फांदते , मेंढ़क
न अश्व रहे , न अश्वपुत्र , न ही अश्वपति
न लम्बी दौड़ , न ऊंची कूद ,
न रही कहीं वो गति ,
मीटर दो मीटर की दौड़ें हैं ,
फुट दो फुट ऊंची कूदें हैं ,
आस पास तक गूंज ले
बस ऐसी ही आवाजें हैं ।
उम्मीदों के क्या कहने ,
अरमान वही घोड़ों जैसे ,
नाल हो , जीन हो ,
घोड़े वाली कलगी हो ,
ऊंचाई से क्या होता ,
ऊंचा ही तो बुरा होता है ,
मेंढ़क से तो हर कोई
नीचे उतर के बात करता .
कुछ तो पड़े रहते हैं चरणों में ,
ज़रा भी ऊपर जायेंगें तो , डर है
संपर्क और कृपा से ही चले जायेंगें
मेंढ़क हैं , तालाब की चिंता है
उसके आगे क्या रखा है .
शान देखिये मेंढकों की
नाल पहनाई जा रही है ,
बड़ी बड़ी नाल ,
पैरों से बड़ी बड़ी नाल ,
फुदकना तो दूर ,
नाल पहन कर चल नहीं पा रहे हैं , पर ,
पहने क्यों नहीं , घोड़ों की जगह ली है .
टाप तो वैसे ही होनी चाहिए
पहनेगें जरूर , प्रतिष्ठा भी तो चाहिए .

मौलिक एवं अप्रकाशित.
डा० विजय शंकर

Views: 1026

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Comment by Dr. Vijai Shanker on August 8, 2014 at 10:06am
आदरणीय डॉ o आशुतोष मिश्रा जी , आपको रचना पसंद आई , अच्छा लगा , बहुत बहुत धन्यवाद
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 8, 2014 at 9:49am

आदरणीय विजय जी ,,इस अनूठे चिंतन के लिए तहे दिल बधाई ..ऐसी शानदार रचनाएँ बहुत ही कम पढने को मिल पाती हैं ,,पुन बधाई के साथ सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 4, 2014 at 10:25pm
आदरणीय राम शिरोमणि जी , आपको बहुत बहुत धन्यवाद .
Comment by ram shiromani pathak on August 4, 2014 at 9:25pm

ज़ोरदार कहन आदरणीय। .  हार्दिक बधाई आपको। .  सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 4, 2014 at 2:41pm
आदरणीय सविता मिश्रा जी आपकी बधाई के लिए सादर धन्यवाद .
Comment by Dr. Vijai Shanker on August 4, 2014 at 2:40pm
आदरणीय सौरभ जी आपकी ढ़ेर सारी बधाइयों के लिए ढेर सारा धन्यवाद .
Comment by savitamishra on August 4, 2014 at 12:25pm

बहुत सुन्दर ..............सादर बधाईआदरणीय _/\_


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 4, 2014 at 12:17pm

आदरणीय डॉक्टर साहब, इस बिम्बात्मकता ने मोह लिया... क्या खूब ! क्या खूब !
विसंगतियों की यह पराकाष्ठ है या इसके आगे भी कुछ बाकी है ! यदि हाँ, तो कोफ़्त होती है ऐसे वैचारिक विकास और ऐसी भौतिक उन्नति पर, जहाँ बौने शासक वर्ग की अपेक्षाएँ-आकांक्षाएँ दानवी ढंग से विकराल हैं. इस बहुत अच्छी कविता के लिए ढेर सारी बधाइयाँ
सादर

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 3, 2014 at 3:37pm
आदरणीय विजय निकोर जी , आपको व्यंग पसंद आया, अच्छा लगा , धन्यवाद .
Comment by vijay nikore on August 3, 2014 at 3:28pm

//शान देखिये मेंढकों की
नाल पहनाई जा रही है ,
बड़ी बड़ी नाल ,
पैरों से बड़ी बड़ी नाल ,
फुदकना तो दूर ,
नाल पहन कर चल नहीं पा रहे हैं , पर ,
पहने क्यों नहीं , घोड़ों की जगह ली है .//

प्रभावशाली रचना के लिए बधाई, आदरणीय विजय जी।

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