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धूप, दीप, नैवेद बिन, आया तेरे द्वार

भाव-शब्द अर्पित करूँ, माता हो स्वीकार

 

उथला-छिछला ज्ञान यह, दंभ बढ़ाए रोज

कुंठाओं की अग्नि में, भस्म हुआ सब ओज

 

चलते-चलते हम कहाँ, पहुँच गए हैं आज

ऊसर सी धरती मिली, टूटे-बिखरे साज

 

मौन सभी संवाद हैं, शंकाएँ वाचाल

काई से भरने लगा, संबंधों का ताल

 

नयनों के संवाद पर, बढ़ा ह्रदय का नाद

अधरों पर अंकित हुआ, अधरों का अनुनाद

 

तेरे-मेरे प्रेम का, अजब रहा संयोग

नयनों ने गाथा रची, नयनन योग-वियोग

 

जटिल सभी अभिप्राय हैं, क्लिष्ट हुए सब शब्द

जड़ होती संवेदना, अवमूल्यन प्रत्यब्द  

 

लहर-लहर हर भाव है, भँवर हुआ अब दंभ

विह्वल सा मन ढूँढता, रज-कण में वैदंभ 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 18, 2014 at 10:21pm

बहुत सुन्दर दोहे सभी एक से बढ़ के एक शिल्प पर सधे हुए.बहुत-बहुत बधाई इस दोहावली पर ब्रिजेश जी |

Comment by kalpna mishra bajpai on July 18, 2014 at 10:15pm

सुंदर दोहे रचे है आप ने बधाई आपको /सादर 

Comment by बृजेश नीरज on July 18, 2014 at 7:05pm

आदरणीय जितेन्द्र जी, आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on July 18, 2014 at 7:04pm

आदरणीया गीतिका जी आपका हार्दिक आभार! 

आप द्वारा इंगित चरण मुझे तो सही लगा. फिर भी, कुछ कमी होगी ऐसा मैं मानता हूँ. कृपया संशोधन के लिए मार्गदर्शन करें.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on July 18, 2014 at 1:07pm

सभी दोहे बहुत सुंदर लगे आदरणीय बृजेश जी , बहुत कुछ कह जाते इन दोहों पर आपको हार्दिक बधाई

Comment by वेदिका on July 18, 2014 at 11:37am
सुन्दर दोहा प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई आ0 बृजेश जी!
आखिरी दोहे का तीसरा चरण मात्रिक होते हुए भी प्रवाह में बाधित लगा। कुछ गलत हो तो क्षमा कीजियेगा आदरणीय!

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